Friday, 28 December 2018

सुयोधन कैसे बना 'दुर्योधन' महाभारत का काला सच... || Kaal Chakra

        सुयोधन कैसे बना 'दुर्योधन'

'दुर्योधन' या 'सुयोधन', जिसके इर्द-गिर्द ही अधर्म ने और उसके नेत्रहीन पिता ने अपनी विजय का ताना बाना बुना था, महाभारत का मुख्य पात्र था. दुर्योधन का अहंकार भाव ही इस युद्ध की कटु परिणति का मुख्य कारण था। दुर्योधन अंत तक भी वासुदेव कृष्ण की धर्म स्थापना में आसक्ति को नहीं समझ पाया और अपने भाई-बान्धवों का समूल नाश करवा बैठा पर क्या दुर्योधन का इस परिदृश में उपस्थित होनाऔर    उसकी अनीति ही महाभारत के विनाशकारी समर का कारण था? शायद नहीं दुर्योधन को ही सिर्फ दोष देना ऐसा ही होगा जैसा दीये की कालिख के लिए केवल लौ को ही दोष देना और कालिख में तेल की भूमिका को नगण्य मानना पर जो भी हो, दुर्योधन के नियमपूर्ण अधर्म और वासुदेव कृष्ण के नियमहीन धर्म के परस्पर युद्ध में धर्म का ही पलड़ा भारी रहा और इसी विजय ने इस महाभारत को 'धर्मग्रन्थ' का दर्जा दे दिया। आईये दोस्तों दुर्योधन के कुछ पहलुओं पर नजर डालते हैं और ये समझने का प्रयास करते हैं की क्या वाकई दुर्योधन कभी सुयोधन था?
ये काल चक्र है... 
दुर्योधन का जन्म माता गांधारी की कोख से हस्तिनापुर के महल में हुआ पर जन्म से ही वह बालक विवादों और महत्वाकांक्षाओं की बलि चढ़ गया  यह बहुत कम लोग जानते हैं कि दुर्योधन का असली नाम ‘सुयोधन’ था  सुयोधन का अर्थ है भीषण आघातों से युद्ध करने वाला पर बालक सुयोधन पर पिता की राजगद्दी की महत्वाकांक्षा और मामा के हस्तिनापुर के विनाश के मंसूबों ने विपरीत प्रभाव डाला। जब पांडव पुत्र माता कुंती के साथ वन से हस्तिनापुर आए तब सुयोधन को इन पांच पांडवों को देखकर क्रोध और प्रतिस्पर्धा की भावना का अनुभव हुआ और वह मन ही मन उन ऋषि वेशधारी पांडव पुत्रों से घृणा करने लगा पर जब उसे युधिष्ठिर के भावी राजा बनने के बारे में पता चला तब वह कुंठा से भर उठा क्योंकि जिस राजप्रासाद को वह बचपन से स्वयं की सम्पत्ति समझ कर बैठा था उसे ये पांडव छीन सकते थे बस यहीं से सुयोधन से 'दुर्योधन' का जन्म हुआ और उसने पांडव पुत्रों को अपने मामा शकुनी की सहायता से समाप्त करने की कोशिशें शुरू कर दी। 

लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि क्या महाभारत में दुर्योधन ही एकमात्र ऐसा व्यक्ति था, जिसने छल का साथ दिया हो? वस्तुतः दुर्योधन पांडवों को राजसिंहासन का असली उत्तराधिकारी नहीं समझता था क्योकि धृतराष्ट्र, पांडू से बड़ा था पर नेत्रहीन होने के कारण उसे राजा नहीं बनाया गया परन्तु अब वह कुरुकुल के ज्येष्ठ पुत्र धृतराष्ट्र का ज्येष्ठ पुत्र था अतः वह स्वयं को ही युवराज समझता था और अब चुंकि उसके पिता तख़्त पर आसीन थे तब वह युवराज बनने के सपने आंखों में संजोये बैठा था साथ ही वह पांडवों को पांडू के असली पुत्र नहीं मानता था क्योंकि पांडव 'योग' से उत्पन्न हुए थे और पांडू उनके जैविक पिता नहीं थे लेकिन जैसा कि नियम था कि राजा का पुत्र ही राजा बन सकता है अतः युधिष्ठिर ही तख़्त का असली वारिस था और साथ ही युधिष्ठिर ज्येष्ठ कुरु पुत्र था.  वह गदा युद्ध में संसार का महानतम और अद्वितीय योद्धा था। यहां तक स्वयं यदुवंशी बलराम, जो कि भीम और दुर्योधन दोनों के गुरु थे, भी दुर्योधन को सर्वश्रेष्ठ गदाधारी मानते थे। उसमें बेशक बल तो भीम से कम था परन्तु चपलता आकाशीय बिजली के सामान थी। उसकी इन्हीं क्षमताओं के फलस्वरूप अनेक राजा महाभारत युद्ध में उसके सहगामी बने. जब भीम और दुर्योधन का गदायुद्ध चल रहा था तब गांधारी के सतीबल और दुर्योधन के कड़े व्यायाम के फलस्वरूप, दुर्योधन लोहे के समान कठोर हो गया पर उसका जंघा इतना कठोर नहीं था। इस भीषण महायुद्ध में भीम की पराजय होती दिख रही थी। चुंकि दुर्योधन के सभी सम्बन्धी मारे जा चुके थे अतः वह राज्य लेने का इच्छुक नहीं था पर भीम से जीतना उसका परम लक्ष्य बन चुका था। इस स्थिति में भीम थकने और हारने लगा तब माधव कृष्ण भीम को दुर्योधन की जंघा तोड़ने के प्रतिज्ञा याद दिलवाई। भीम ने युद्ध के नियमों के विपरीत दुर्योधन की जंघा पर प्रहार किया और वह महावीर लड़ाका दुर्योधन भूमि पर गिर पड़ा। नियमों के मुताबिक गदा युद्ध में पेट से नीचे प्रहार वर्जित था पर जिन मर्यादाओं को दुर्योधन ने जीवनभर तोड़ा उन्हीं मर्यादाओं को तोड़कर दुर्योधन को भूमि पर मरणासन्न अवस्था में गिरा दिया गया और उसे अपने अनैतिक कार्यो को याद करने के लिए वहीं छोड़ दिया गया। 
दुर्योधन, युधिष्ठिर की तुलना में नैतिक रूप से पतित था और उसके राजा रहते पृथ्वी पर 'धर्मराज्य' की स्थापना असंभव थी और धर्म की स्थापना ही योगेश्वर कृष्ण का परम लक्ष्य था अतः पांडवों का साम्राज्य ही मधुसूदन के लक्ष्य को पूर्ण कर सकता था।

  यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निर्घषणच्छेदन तापताडनैः।
 तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा।।
 भावार्थ :
घिसने, काटने, तापने और पीटने, इन चार प्रकारों से जैसे सोने का परीक्षण होता है, इसी प्रकार त्याग, शील, गुण, एवं कर्मों से पुरुष की परीक्षा होती है ।

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Saturday, 15 December 2018

महाभारत के बाद सुदर्शन चक्र का क्या हुआ ??....Kaal Chakra

                         सुदर्शन चक्र

महाभारत के युद्ध मे भगवान  कृष्ण ने शस्त्र नहीं उठाया क्यूँ की वो जानते थे अगर उन्होने शस्त्र उठा लिया तो उनके सामने कोई टीक नहीं पाएगा सभी मारे जाएंगे कृष्ण  चाहते थे की दोनों पक्षों को बराबर मौका मिलना चाहिए। परंतु कृष्ण के पास ऐसी कौन सी शक्ति जिससे वो एक पल मे ही युद्ध  की संपति कर सकते थे वो था भगवान कृष्ण का सुदर्शन चक्र। कहते हैं कि सुदर्शन चक्र एक ऐसा अचूक अस्त्र था कि जिसे छोड़ने के बाद यह लक्ष्य का पीछा करता था और उसका काम तमाम करके वापस छोड़े गए जाता है। सुदर्शन चक्र शत्रु पर चलाया  नहीं जाता यह प्रहार करने वाले की इच्छा शक्ति से भेजा जाता है| यह चक्र किसी भी चीज़ को खत्म करने की क्षमता रखता है| आइये जानते हैं महाभारत युद्ध के बाद सुदर्शन चक्र कहा गया? क्या कभी हमे इसकी शक्ति का अंदाज़ा हो पाएगा? कहाँ है सुदर्शन चक्र ?
ये काल चक्र है ॥ 
 महाभारत में सुदर्शन चक्र के विषय मे उल्लेख है कि अत्यन्त शक्तिशाली चक्र  से एक शक्ति – युक्त अस्त्र प्रक्षेपित किया गया…धुएँ के साथ अत्यन्त चमकदार ज्वाला, जिस की चमक दस हजार सूर्यों के चमक के बराबर थी, का अत्यन्त भव्य स्तम्भ उठा…वह वज्र के समान अज्ञात अस्त्र साक्षात् मृत्यु का भीमकाय दूत था जिसने वृष्ण और अंधक के समस्त वंश को भस्म करके राख बना दिया…उनके शव इस प्रकार से जल गए थे कि पहचानने योग्य नहीं थे. उनके बाल और नाखून अलग होकर गिर गए थे… यह चक्र एक पूरी सेना को सम्पत करने की क्षमता रखता था। 
पुरानो मे बताया गया है की भगवान विश्वकर्मा ने सूर्य के तेज़ से तीन चीजों का निर्माण किया पुष्पक विमान त्रिसुल और सुदर्शन चक्र। परंतु यहाँ सवाल यह उठता है की महाभारत के बाद सुदर्शन चक्र का क्या हुआ इसका उत्तर हमे भविष्य पुराण मे मिलता है उसमें लिखा गया है की जब भगवान कृष्ण ने देह त्याग किया तब सुदर्शन चक्र वहीं उसी जगह मिट्टी मे दफन हो गया और इस कलयुग मे जब भगवान विष्णु फिर से कल्कि रूप धरण करके वापिस इस पृथ्वी पर आएंगे तब एक बार पुनः वो सुदर्शन चक्र धरण करेंगे। 
दोस्तों प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ब्रह्मास्त्र, आग्नेयास्त्र सुदर्शन चक्र जैसे अस्त्र अवश्य ही विभिन्न  शक्ति से सम्पन्न थे, किन्तु हम स्वयं ही अपने प्राचीन ग्रंथों में वर्णित विवरणों को मिथक मानते हैं और उनके आख्यान तथा उपाख्यानों को कपोल कल्पना, हमारा ऐसा मानना केवल हमें मिली दूषित शिक्षा का परिणाम है जो कि, अपने धर्मग्रंथों के प्रति आस्था रखने वाले पूर्वाग्रह से युक्त, पाश्चात्य विद्वानों की देन है, पता नहीं हम कभी इस दूषित शिक्षा से मुक्त होकर अपनी शिक्षानीति के अनुरूप शिक्षा प्राप्त कर भी पाएँगे या नहीं।
आज का श्लोका ज्ञान 
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् |
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ||

अर्थात् : महर्षि वेदव्यास जी ने अठारह पुराणों में दो विशिष्ट बातें कही हैं | पहली –परोपकार करना पुण्य होता है और दूसरी — पाप का अर्थ होता है दूसरों को दुःख देना |

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Sunday, 28 October 2018

क्या होता अगर वीर बर्बरीक और महाप्रतापी इंद्रजीत के बीच युद्ध होता || Ka...



        बरबरीक
और इंद्रजीत
जब जब पृथ्वी पर पाप का घड़ा भरने लगता है तब तब
ईश्वर धर्म की स्थापना के लिए जन्म लेते हैं और इसी से रचना होती है नए धार्मिक
ग्रंथ की जो युगो युगो तक मनुष्य को मार्गदर्शन देता है। महाभारत और रामायण भी ऐसे
ही ग्रंथ हैं जिसमे भारत के इतिहास के बारे मे विस्तार से लिखा गया है जो यह सिद्ध
करता है की भारत एक देश नहीं अपितु राष्ट्र है एक राष्ट्र जो जन्म नहीं लेता न
बनाया जाता है वो तो युगो युगो से यथावत है जिसमे संस्कृति बनती है धर्म बनाता है।
महाभारत और रामायण की कथाएँ हमे आज के जीवन मे कठिन से कठिन समस्याओं से बाहर
निकालने की प्रेरणा देती हैं। हम भली भाति जानते हैं की दोनों ही ग्रन्थों मे धर्म
युद्ध का वृतांत है और कुछ महान योद्धाओं का जिक्र आता है। दोस्तों हमने अपने
पिछले अध्यायों मे रामायण और महाभारत के कुछ महान पत्रों जैसे रावण और पितामह
भीष्म
, लक्ष्मण और अर्जुन, कुंभकर्ण और भीम जैसे पत्रों की
तुलना की है इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए आज हम महाभारत और रामायण से दो और महारथियों
की तुलना करेंगे॥ पहला है महाबली भीम के पौत्र बरबारीक और दूसरा है रावण का
महाप्रतापी पुत्र मेघनाद इंद्रजीत। आज इस विडियो मे दोनों ही योद्धाओ की विषताओं
और कमियों पर बात करेंगे और ये समझने का प्रयास करेंगे की कोन किससे बेहतर योद्धा
है।
ये काल चक्र है...
यहाँ एक तरफ हैं महाबली भीम के पौत्र और अतिबलशाली
घटोत्कच का पुत्र बरबरीक जिसकी शक्ति से प्रभावित होकर स्वम भगवान कृष्ण को  उसके समक्ष आना पड़ा और महाभारत युद्ध न लड़ने
देने के लिए युद्ध से पहले ही उन्होने अपने सुदर्शन से उसका सर काटना पड़ा। शक्ति
और सामर्थ्य का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है की बरबारीक के कटे सिर ने पूरा
महाभारत युद्ध देखा क्यूँ की भगवान कृष्ण ने उसे ऐसा वरदान दिया था।
तो दूसरी तरफ हैं देवताओं तक को उनके राज्य से
बेदखल कर उनके राजा इंद्रा को बंदी बना लेने वाले मेगनाद इंद्रजीत। उनके ताकत का
अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है की राम रावण युद्ध मे अपनी माया से उन्होने
लक्ष्मण तक को मूर्छित कर दिया।
 आइए दोनों
हीं योद्धाओं की विशेषताओं पर नजर डालते हैं और ये समझने का प्रयास करते हैं की इन
दोनों मे कोण अधिक श्रेष्ठ था।
पहला सिक्षा— इंद्रजीत के गुरु थे गुरु शुक्राचार्य
और बरबारीक के गुरु उनकी माता अहिलावती थी जो एक नागकन्या थीं। नैतिक सिक्षा के
आधार पर यहाँ बरबारीक जायदा मजबूत हैं।
अब आते उनके अस्त्र सस्त्र पर— इंद्राजीत के पास उस
वक़्त के तीनो ही महान अस्त्र ब्रह्मास्त्र वैष्णवास्त्र और पसुप्तास्त थे. और उसका
रथ भी एक अस्त्र की भांति शक्तिशाली था. 
इन्द्रजीत के पास नागपास अस्त्र भी था जिससे उसने लक्ष्मण तक को मुर्चित कर
दिया था परन्तु बरबारीक के अस्त्रों की बराबरी फिर भी नही की जा सकती है उसके पास
ऐसे तीन बान थे जिनसे वो समस्त सतरु सेन का विनाश कर सकता था। उसके एक बान की
काबलियत को देख कर स्वम भगवान कृष्ण को बरबारीक को युद्ध से अलग रखने के लिए उसका
शीश काटना पड़ा। महाभारत के सभी महारथियों
aur समस्त सैनिकों
का एक पल मे विनाश करने वाले बनो की तुलना किसी से संभव नहीं है। उन बनो के समक्ष
इंद्रजीत जैसा योद्धा भी छोटा प्रतीत होता है।
अब बात करते हैं बहुबल कीइन्द्रजीत एक मायावी योधा था उसने अपने माया से इंद्रा तक को पराजित कर
दिया था और उसी के बाद उसका नाम इन्द्रजीत पड़ा लक्ष्मण जैसे योद्धा को मूर्छित
करने वाला इंद्रजीत ही था। परंतु बरबारीक को भी कम नहीं आँका जा सकता है महाभारत
मे ही एक प्रसंग ऐसा भी आता है जब भूल वश एक बार बरबारीक का सामना अपने ही दादा
भीम से हो गया था तब भी बरबारीक अपने दादा से पराजित नही हुआ था ।
दोस्तों वरदान के नजरिए से देखा जाए तो जब बरबारीक
ने भगवान कृष्ण को अपना शीश दान स्वरूप दिया तब भगवान कृष्ण ने उसे ये वरदान दे
दिया की इस बलिदान को हमेशा याद रखा जाएगा और तुम्हारी पुजा मेरे ही एक रूप मे
युगों युगों तक होगी क्युकी बर्बरीक का शीश खाटू नगर में दफनाया गया था इसलिए
उन्हें खाटूश्याम जी कहते है। इधर इंद्राजीत उसे युद्ध में कोई भी पराजित नहीं कर
सकता है. यहाँ भी बरबरीक का वरदान इंद्रजीत के वरदान से श्रेस्ठ दिखता है।
दोस्तों वीर बरबारीक और महाप्रतापी इंद्रजीत के बीच
अगर युद्ध होता तो उसमे कौन वजई होता इसपर आप अपने विचार हमे कोमेंट बॉक्स मे
लिखकर बता सकते हैं विडियो पसंद आई है तो विडियो को लाइक जरुर करे और ऐसी ही
धार्मिक विदेओस देखने के लिए हमारे इस चैनल को सुब्स्कृबे जरूर करे । धन्यवाद।    

     

Thursday, 4 October 2018

सिर्फ एक ही युद्ध हारे थे हनुमान जी, जानिए कौन था वह योद्धा || Kaal Chakra



जिंदगी में एक ही युद्ध हारे थे हनुमान, जानिए कौन था वह
योद्धा !!
हनुमान सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ हैं। हनुमान के बगैर न तो
राम हैं और न रामायण। राम-रावण युद्ध में हनुमानजी ही एकमात्र अजेय योद्धा थे
जिन्हें कोई भी किसी भी प्रकार से क्षति नहीं पहुंचा पाया था। यूं तो हनुमानजी के
पराक्रम
, सेवा, दया और दूसरों का
दंभ तोड़ने की हजारों गाथाएं हैं लेकिन
आज हम पुरानो के माध्यम से ऐसे घटना को लेकर आए हैं जब
हनुमान जी को किसी भी युद्ध मे पहली बार हार का सामना करना पड़ा इतना ही नहीं इस
युद्ध में हनुमान जी को हराने वाला कोई और नहीं एक राम भक्त ही था... तो कौन था वह
योद्धा जिसने हनुमान जी को हरा दिया और उस युद्ध का इस पृथ्वी पर क्या प्रभाव
पड़ा...
?
ये काल चक्र है॥
दोस्तों किसी समय मे मच्छिंद्रनाथ
नाम के एक बहुत बड़े तपस्वी हुआ करते थें
, एक बार जब वो रामेश्वरम में आए तो भगवान राम द्वारा निर्मित
सेतु देख कर वे भावविभोर हो गए और प्रभु राम की भक्ति में लीन होकर वे समुद्र में
स्नान करने लगे। तभी वहां वानर वेश में उपस्थित हनुमान जी की नज़र उन पर पड़ी वो
जानते थे की मचींद्रनाथ जी कितने बड़े तपस्वी हैं फिर भी उन्होंने मच्छिंद्रनाथ जी
के शक्ति की परीक्षा लेनी चाही। इसलिए हनुमान जी ने अपनी लीला आरंभ की
, जिससे वहां जोरों की बारिश होने लगी, ऐसे में बानर रूपी हनुमान जी उस बारिश से बचने के लिए एक
पहाड़ पर वार कर गुफा बनाने की कोशिश का स्वांग करने लगे। दरअसल उनका उद्देश्य था
कि मच्छिंद्रनाथ का ध्यान टूटे और उन पर नज़र पड़े और वहीं हुआ मच्छिंद्रनाथ ने
तुरंत सामने पत्थर को तोड़ने की चेष्टा करते हुए उस वानर से कहा
, ‘हे वानर तुम क्यों ऐसी मूर्खता कर रहे हो, जब प्यास लगती है तब कुआं नहीं खोदा जाता, इससे पहले ही तुम्हें अपने घर का प्रबंध कर लेना चाहिए था।
 ये सुनते ही वानर रूपी हनुमान जी ने
मच्छिंद्रनाथ से पूछा
, आप कौन हैं?
जिस पर मच्छिंद्रनाथ ने स्वयं
का परिचय दिया
मैं एक सिद्ध योगी हूं
और मुझे मंत्र शक्ति प्राप्त है।
जिस पर हनुमान जी ने
मच्छिंद्रनाथ की शक्ति की परीक्षा लेने के उद्देश्य से कहा
, वैसे तो प्रभु श्रीराम और महाबली हनुमान से श्रेष्ठ योद्धा
इस संसार में कोई नहीं है
, पर कुछ समय
उनकी सेवा करने के कारण
, उन्होंने
प्रसन्न होकर अपनी शक्ति का कुछ प्रतिशत हिस्सा मुझे भी दिया है
, ऐसे में अगर आप में इतनी शक्ति है और आप पहुंचे हुए सिद्ध
योगी है तो मुझे युद्ध में हरा कर दिखाएं
, तभी मैं आपके तपोबल को सार्थक मानूंगा, अन्यथा स्वयं को सिद्ध योगी न कहें।
यह सब सुनकर मच्छिंद्रनाथ जी ने
उस वानर की चुनौती स्वीकार कर ली और युद्ध की शुरुआत हो गई। जिसमें वानर रुपी
हनुमान जी ने मच्छिंद्रनाथ पर एक-एक करके कई बड़े पर्वत फेंके
, पर इन पर्वतों को अपनी तरफ आते देख मच्छिंद्रनाथ ने अपनी
मंत्र शक्ति का प्रयोग किया और उन सभी 
पर्वतों को हवा में स्थिर कर उन्हें उनके मूल स्थान पर वापस भेज दिया। इतना
देखते ही महाबली को क्रोध आया उन्होनें मच्छिंद्रनाथ पर फेंकने के लिए वहां
उपस्थित सबसे बड़ा पर्वत अपने हाथ में उठा लिया। जिसे देखकर मच्छिंद्रनाथ ने
समुंद्र के पानी की कुछ बूंदों को अपने हाथ में लेकर उसे वाताकर्षण मंत्र से सिद्ध
कर उन पानी की बूंदों को हनुमान जी के ऊपर फेंक दिया।
इन पानी की बूंदों का स्पर्श
होते ही हनुमान के शरीर मे अजीब सी हलचल हुई  और एकदम से स्थिर हो गया
, साथ ही उस मंत्र की शक्ति से कुछ क्षणों के लिए हनुमान जी
की शक्ति छिन्न गई और ऐसे में वे उस पर्वत का भार न उठा पाने के कारण तड़पने लगे।
तभी हनुमान जी का कष्ट देख उनके पिता वायुदेव वहां प्रगट हुए और मच्छिंद्रनाथ से
हनुमान जी को क्षमा करने की प्रार्थना की। वायुदेव की प्रार्थना सुन मच्छिंद्रनाथ
ने हनुमान जी को मुक्त कर दिया और हनुमान जी अपने वास्तविक रुप में आ गए। इसके बाद
उन्होंने मच्छिंद्रनाथ से कहा
हे
मच्छिंद्रनाथ
, मैं आपको भलीभांति जानता
था
,
फिर भी मैं आपकी शक्ति की परीक्षा लेने की प्रयास कर बैठा, इसलिए आप मेरी इस भूल को माफ करें। ये सुनकर और स्थिति को
समझते हुए मच्छिंद्रनाथ जी ने हनुमान जी को माफ़ कर दिया।
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Sunday, 30 September 2018

क्या सच मे ‘खलनायक’ था रावण, ये विडियो आपकी धारण बदल सकता है। Kaal Chakra



क्या वाकईखलनायकथा रावण, ये विडियो आपकी धारण बदल सकता है
शिव भक्त होने के बावजूद बेहद अभिमानी और आत्मप्रशंसक रावण
ने विवेकशून्य होकर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की पत्नी सीता का हरण किया। रावण
के इसी कुकृत्य की वजह से उसका अंत सुनिश्चित हुआ। रावण के चरित का अवलोकन करे तो
वह उद्भ
राजनीतिज्ञ, महापराक्रमी
योद्धा
, शास्त्रों का प्रखर ज्ञाता ,प्रकान्ड विद्वान
पंडित महाज्ञानी और महान शिव भक्त था. रावण के वंश को देखे तो वह सारस्वत ब्राह्मण
पुलस्त्य ऋषि का पौत्र और विश्रवा का पुत्र था.
जब भी रावण का नाम हमारे सामने आता है, तो हमारे जहन में पूरी तरह नकारात्मक छवि उभरकर आती है. हम पौराणिक रावण
को सिर्फ और सिर्फ खलनायक के तौर पर ही जानता है
. लेकिन क्या
वाकई रावण एक खलनायक था
? क्या वाकई हमारा इतिहास उसे जिस रूप
में जानता
रावणवैसा ही था। इस विडियो
में हम आपको रावण के चरित्र की वो बातें बताएंगे जो आपकी मानसिकता के विपरीत जाकर सोचने
के लिए विवश कर सकता है।
  ye kaal
chakra hai . लंकाधिपति रावण अपूर्ण इच्छाएँ ::
1.  रावण चाहता था कि समुद्र का पानी खारे की स्थान पर मीठा हो जाए।
समुद्र का पानी पीने योग्य नहीं होता और ना ही वह खेती के काम आता था। इसलिए उसकी यह
हार्दिक इच्छा थी कि समुद्र का पानी मीठा हो जाए ताकि पीने की पानी की कमी न हो।
2.  रावण अपनी प्रजा और सामान्य जन के लिए हमेशा चिंतित रहता था।
उसने बाड़ और सूखे से बरबाद होते लोग देखे थे। वह चाहता था कि बारिश कब और कितनी हो
, इसका सारा नियंत्रण आम जन के हाथ में होना चाहिए।
रावण चाहता था कि आम जन का इन्द्र देवता के साथ सीधा संपर्क होना चाहिए।
3.  रावण चाहता था कि सोने जैसी बह्मूल्य धातु में सुगंध होनी चाहिए, ताकि आम जन उस स्गंध को पहचान सके और सोने जैसी
बह्मूल्य धातु उनके हाथ लग जाए। ऐसा इसलिए क्योंकि वह अपनी प्रजा को निर्धनता से मुक्ति
दिलवाना चाहता था।
4.  रावण चाहता था कि स्वर्ग पर सिर्फ देवताओं का कब्जा नहीं होना
चाहिए। वह आम जन के लिए भी स्वर्ग के दरवाजे खोलना चाहता था। रावण की चाहत थी कि सामान्य
व्यक्ति भी स्वर्ग तक पहुंच सके
, जिसके लिए
वह एक सीढ़ी का निर्माण करना चाहता था।
5.  रावण बेहद काले वर्ण का था, उसे कई बार इस वजह से अपमानित भी होना पड़ा। वह चाहता था कि धरती पर रहने वाले
हर व्यक्ति का रंग एक ही होना चाहिए
, कोई काला या गोरा ना हो,
ताकि कभी किसी को कभी शर्मिअंदा ना होना पड़े।

क्षमा शस्त्रं करे यस्य
दुर्जन: किं करिष्यति ।
अतॄणे पतितो वन्हि:
स्वयमेवोपशाम्यति ॥

क्षमारूपी शस्त्र जिसके हाथ
में हो
,
उसे दुर्जन क्या कर सकता है ? अग्नि , जब
किसी जगह पर गिरता है जहाँ घास न हो
, अपने आप बुझ जाता है ।
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Thursday, 27 September 2018

सतयुग का आगमन कब और कैसे ?? Kaal Chakra



        सतयुग
काल, समय या युग परिवर्तन कब होगा? कैसे होगा और किस मानव शरीर के द्वारा होगा? भविष्य के प्रति जिज्ञासा मानव स्वभाव का सबसे रूचिकर विषय
है। बचपन
,
कोमल, भावुक
निश्छल होता हैं। उठती उम्र में चंचलता आतुरता दिखाई पड़ती है। प्रौढ़ता में
अहंकार का बोल बाला रहता हैं और अन्त में जरा जीर्ण अवस्था अपनी मौत मरती हैं।
इसके उपरान्त नया जन्म होता हैं। चार युग जीवन की इन्हीं चार अवस्थाओं की तरह हैं।
इन दिनों विश्व मानवता मरण की तैयारी कर रहीं हैं
, पर वह दिन दूर नहीं, जब उज्ज्वल भविष्य का नये सिरे से निर्माण होगा। चक्र घूमते
हुए बार-बार अपने आरम्भिक स्थान पर आता हैं। कल्प कल्पान्तरों में यही होता आया
हैं। वस्त्र पुराना होने पर नये की अवधारणा ऐसी आवश्यकता हैं जो पूरी हुए बिना रह
ही नहीं सकती। देखना इतना भर हैं कि इस शुभारम्भ का श्री गणेश का नव निर्धारण किस
प्रकार होगा
? कलयुग के बाद सतयुग
कैसा होगा....
ये काल चक्र है....
हर युग की अपनी-अपनी वरिष्ठता
और महत्वाकाँक्षा होती है। आज हर व्यक्ति साज- सम्पन्नता
, साज-सज्जा की बहुलता इसलिए चाहता हैं कि उसे अधिकाधिक
सुविधा एवं ख्याति मिले। यही मनोवृत्ति अनेक दिशाओं में घुमाती है। इसी प्रवाह में
परिवर्तन होने पर युग बदलते हैं। सतयुग विश्लेषण करने पर सिद्ध होता है कि उस समय
के व्यक्तियों की शारीरिक बनावट भले ही आधुनिक मानवों जैसी रही हो पर मानसिकता में
, स्वभाव प्रयास में, भारी अन्तर रहा है। उन दिनों मनुष्य अधिक परिश्रमी और साहसी
होंगे।  असत्य द्वारा चाहे अपना ही हित
होता है
,
पर लोग उससे घृणा करेंगे। सत्य पक्ष द्वारा यदि अपना अहित
हुआ हो तो भी बुरा न मानेंगे। जब इस प्रकार के लक्षण दिखाई देने लगें तो समझना
चाहिए कि सतयुग आ गया।
कलयुग के अंत मे कल्कि अवतार
होगा कल्कि अवतार समाज के विचारों
, मान्यताओँ और गतिविधियों की दिशाधारा में बदलाव के लिए
होगा। इस बार का ये अवतार असुरों या दुष्टों के संहार के बजाय उनके मन मानस को
अपने विधान से बदलने की नीति पर है। सतयुग मे चरो ओर धर्म ही धर्म दिखेगा
, ऋषि परम्परा जीवित होगी, वही अंकुरित होकर फली फूलेगी और समस्त जन समुदाय उसका समग्र लाभ उठाएगा, दृष्टिकोण बदलने से वातावरण का परिवर्तन होता हैं। उत्थान के बाद जिस
प्रकार पतन देखा जाता हैं उसी प्रकार पतन के उपरान्त अभ्युदय का विज्ञान भी
सुनिश्चित होगा। वर्तमान समय मे इस दुनिया मे मानवीय समाज के सामने जितनी भी
प्राब्लम है उन सबका कारण है मानवीय चिंतन का दूषित हो जाना
,
विचार परिवर्तन से ही युग परिवर्तन संभव है। परिवर्तन प्रकृति का नियम है
ब्राह्माण्ड व्यापी देव शक्तिया अब इस सृष्टि मे आमूल चूल परिवर्तन चाहती है इस
पवन धरा धाम पर देव शक्तिया सतयुगी वातावरण लाने के लिये कृत संकल्पित हैं।
एकवर्णं यथा दुग्धं
भिन्नवर्णासु धेनुषु ।
तथैव धर्मवैचित्र्यं
तत्त्वमेकं परं स्मृतम् ॥

जिस प्रकार विविध रंग रूप की
गायें एक ही रंग का (सफेद) दूध देती है
, उसी प्रकार विविध धर्मपंथ एक ही तत्त्व की सीख देते है

Satya Yuga,
Kaliyug,
सतयुग की आयु,
satyug kalyug,
satyug ke avtar,
satyug age,
Satyuga After Kalyuga,
कलयुग के बाद सतयुग कैसा होगा,

Friday, 14 September 2018

बीरबल की मृत्यु का रहस्य || Kaal Chakra



       बिरबल
की मृत्यु
भारत का इतिहास और संस्‍कृति गतिशील है
और यह मानव सभ्‍यता की शुरूआत तक जाती है। यह सिंधु घाटी की रहस्‍यमयी संस्‍कृति
से शुरू होती है और भारत के दक्षिणी इलाकों में किसान समुदाय तक जाती है।
इसी इतिहास मे एक पात्र ऐसा था जिसके चतुरता का कोई
तोड़ न था। हम बात कर रहे हैं राजा अकबर के सखा बीरबल की
, भारत में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति
होगा जिसने अकबर बीरबल के किस्से न पढ़े हों
| अपने चातुर्य
और बुद्धिबल से अकबर के नवरत्नों में सबसे प्रमुख स्थान रखने वाले बीरबल का
सम्पूर्ण जीवन उतार और चढ़ाव की लोमहर्षक कहानी है। अकबर ने उनकी बुद्धिमत्ता से
प्रसन्न होकर कविराय तथा बीरवर की उपाधि दी थी
, जो कालान्तर
में अपभ्रंश होकर बीरबल में परिवर्तित हो गई
| दोस्तों
अपने अकबर बिर्बाल की अनेकों कहानियाँ सुनि होंगी आज इस वीडियो में हम बात करेंगे
बीरबल के मृत्यु की कैसे और कब हुई बीरबल की मृत्यु किसने मारा बीरबल को
??
ये काल चक्र है...
बुद्धिमान, हाज़िर जवाब और लोगों को लाजवाब कर
देने वाले शहंशाह अकबर के नवरत्नों में से एक बीरबल का नाम महेश दास था और वो मध्य
प्रदेश के सिधी जिले के घोघरा में पैदा हुए थे.
दिन, महीने और साल दर साल बीतते चले गए
मगर आज भी मध्य प्रदेश के सिधी जिले में सोन नदी के पार बसा घोघरा कमोबेश वैसा ही
है जैसा कई सौ साल पहले हुआ करता था.
कहा जाता है कि
घोघरा गांव में ही बीरबल के पिता गंगादास का घर हुआ करता था और यहीं उनकी माता
अनाभा देवी नें वर्ष
1528 में
रघुबर और महेश नाम के जुड़वां बच्चों को जन्म दिया. घोघरा गांव सालों से उपेक्षित
ही रहा और इसके साथ-साथ उपेक्षित रहे बीरबल की पीढ़ी के लोग.
दोस्तों अफगानिस्तान
के यूसुफ़जई कबीले ने मुग़ल सल्तनत के खिलाफ विद्रोह का झंडा बुलंद किया
| उसके दमन के लिए जो जैन ख़ाँ कोका
के नेतृत्व में पहला सैन्य दल भेजा गया
| लड़ते लड़ते वह सैन्य
दल थक गया तो बीरबल के नेतृत्व में दूसरा दल वहां भेजा गया
| बुद्धि कौशल के महारथी को सैन्य अभियानों का कोई अधिक अनुभव नहीं था |
सिवाय इसके कि वे सदैव सैन्य अभियानों में भी अकबर के साथ रहते थे |
पूर्व के सेनापति कोका को एक हिन्दू के साथ साथ अभियान करना कतई
गवारा नहीं हुआ
| पारस्परिक मनोमालिन्य के चलते स्वात वैली
में
8000 सैनिकों के साथ अकबर के सखा बीरबल खेत रहे |
इतना ही नहीं तो अंतिम संस्कार के लिए उनका शव भी नहीं मिला| किसी ने सोचा भी नहीं था की इतने बुद्धिमान व्यक्ति का अंत इसप्रकार होगा
ये भी कहा जाता है की बीरबल की मृत्यु के बाद राजा अकबर शोक मे डूब गए थे और कई
दिनो तक अन्न का त्याग कर दिया था।

Monday, 3 September 2018

आखिर क्या था वह प्रश्न जिसका उत्तर एक विद्वान मह्रिषी और उसकी आठ पीढ़िया ...



आखिर क्या था वह प्रश्न जिसका उत्तर एक विद्वान मह्रिषी और
उसकी आठ पीढ़िया भी नही दे पायी
, आदि पुराण की एक अनोखी कथा!
प्राचीन भारत में दार्शनिक एवं धार्मिक वाद-विवाद, चर्चा या
प्रश्नोत्तर को शास्त्रार्थ कहते थे
, शास्त्रार्थ का शाब्दिक अर्थ तो शास्त्र का अर्थ है , वस्तुतः मूल
ज्ञान का स्रोत शास्त्र ही होने से प्रत्येक विषय के लिए निष्कर्ष पर पहुँचने के
लिए शास्त्र का ही आश्रय लेना होता है अतः इस वाद-विवाद को शास्त्रार्थ कहते हैं
जिसमे तर्क
,प्रमाण और युक्तियों के आश्रय से सत्यासत्य निर्णय होता है. वैदिक काल में एक
से बढ़कर एक विद्वान ऋषि थे
, उस काल में भी शास्त्रार्थ हुआ करता था , वैदिक काल में
ज्ञान अपनी चरम सीमा पर था
, उस काल में शास्त्रार्थ का प्रयोजन ज्ञान कि
वृद्धि था क्यों कि उस काल कोई भ्रम नहीं था
, ज्ञान के सूर्य
ने धरती को प्रकाशित कर रखा था
, उस काल शास्त्रार्थ प्रतियोगिताएं होती थी , न सिर्फ ऋषि
अपितु ऋषिकाएँ भी एक से बढ़कर एक शास्त्रार्थ महारथी थी
| इसी शास्त्रार्थ मे एक प्रश्न ऐसा उठ गया जिसका उत्तर 8
पढ़ियाँ भी ना दे पायी । तो क्या था वह प्रश्न किसने पूछा था ऐसा कठिन प्रश्न और
एफ़आर किसने उत्तर दिया उस प्रश्न का
ये काल chakra है...
एक आश्रम में विद्वान ऋषि कक्षीवान रहते थे वे प्रत्येक
प्रकार के शास्त्र और वेद में निपुर्ण थे. एक बार वे उन्ही के समान शास्त्रात में
निपुर्ण ऋषि प्रियमेध से मिलने गए तथा उनके आश्रम में पहुँचते ऋषि प्रियमेध द्वारा
उनका खूब आदर सत्कार किया गया. ऋषि कक्षीवान जब भी ऋषि प्रियमेध से मिलते तो दोनों
के बीच बहुत लम्बी शास्त्रात होती इसी तरह उस दिन भी ऋषि कक्षीवान ने प्रियमेध से
एक पहेली पूछी की ऐसी कौन सी चीज है जिसे यदि जलाये तो उस से तनिक भी रौशनी न हो
?
प्रियमेध ने कफ़ि सोच विचार किया परन्तु वे इस पहेली के
उत्तर दे पाने असमर्थ रहे
,
जिस किसी भी चीज
के बारे में विचार करते उन्हें लगता की वह थोड़ी सी ही सही परन्तु रौशनी उत्तपन
करता है. पहली के उत्तर ढूढ़ने के उधेड़बुन में उनकी जिंदगी बीत गयी. जब प्रियमेध
ऋषि का अंत समय नजदीक आया तो उन्होंने कक्षीवान ऋषि को संदेश भेजा की मैं आपकी
पहेली का उत्तर ढूंढ पाने में समर्थ नही हो पाया परन्तु मुझे पूरा विश्वाश है की
भविष्य में मेरे वंश में ऐसा विद्वान जरूर जन्म लेगा जो आपके इस प्रश्न का उत्तर
दे पायेगा. उनके मृत्यु के बाद उनके पुत्र ने 
इस प्रश्न के उत्तर का जिम्मा लिया परन्तु वह इस प्रश्न का उत्तर ढूढ़ पाने
में असमर्थ रहा और एक दिन उसकी भी मृत्यु हो गयी. इस के बाद कक्षीवान के उस प्रश्न
के उत्तर को ढूढ़ने में प्रियमेध की कई पीढ़िया गुजरती गई.
इस तरह प्रियमेध की आठ पीढ़िया कक्षीवान  के प्रश्न का उत्तर ना पा सकी तथा  उत्तर खोजते-खोजते स्वर्ग को प्राप्त हो गई.
कक्षीवान अपने पहेली का हल पाने के लिए जिन्दा रहे. कक्षीवान के पास एक नेवले के
चमड़े से बनी थेली थी जिसमे कुछ चावल भरे थे प्रत्येक वर्ष वे उसमे से एक
एक दाना निकालकर
फेक देते थे. जब तक थेली के सारे चावल खत्म ना हो जाये उन्हें तब तक जीवन  प्राप्त था.
प्रियमेध के नोवी पीढ़ी में साकमश्व नाम का बालक पैदा हुआ व
बचपन से ही बहुत विद्वान था तथा अपने मित्रो के साथ हर शास्त्राथ में वह विजयी
होता था. साकमश्व जब बड़ा हुआ तो उसे एक बात चुभने लगी की एक पहेली का उत्तर उसकी
पूरी
8 पीढ़िया देने में
असमर्थ रही और स्वर्गवासी हो गई परन्तु अब तक उस प्रश्न को पूछने वाला जिन्दा है.
साकमश्व ने निश्चय किया की वह इस प्रश्न का उत्तर ढूढ के ही चेन लेगा. एक दिन उसे
प्रश्न का उत्तर सोचते सोचते सामवेद  का एक
श्लोक सुझा तथा उसने सामवेद  के उस श्लोक
को एक निर्धारित सुर में गाना शुरू किया
, इसके साथ ही उसे प्रश्न का उत्तर मिल गया.
वह तुरंत कक्षीवान के आश्रम की ओर भागा तथा कक्षीवान उसे
देखते ही जान गए की उन्हें आज उनके प्रश्न का उत्तर मिल जायेगा. उन्होंने अपने एक
शिष्य को बुला कर उनकी चावल के दानो से भरी थेली फिकवा दी. साकमश्व ऋषि कक्षीवान
के करीब पहुंचकर उनके प्रश्न का उत्तर देते हुए बोला की जो मनुष्य केवल  ऋचा गाता है साम नही वह गायन उस अग्नि के समान
कहलाता है जिससे प्रकाश पैदा नही होता लेकिन जो ऋग्वेद के ऋचा के बाद सामवेद  का साम भी गाता हो उसका गायन उस अग्नि जैसा है
जिससे रौशनी भी पैदा होती है.  साकमश्व के
उत्तर को सुनकर कक्षीवान संतुष्ट हुए और उसे अपना आशीर्वाद दिया इस प्रकार साकमश्व
ने अपने अपने पूर्वजो का कलंक भी मिटा दिया !

Saturday, 4 August 2018

शिव पार्वती का स्वर्ण महल कैसे बना रावण की सोने की लंका || Kaal Chakra



भगवान शिव और माता पार्वती के स्वर्ण महल की कथा।
भगवान शिव नित्य और अजन्मा हैं। इनका आदि और अंत न होने से
वे अनन्त हैं। इनके समान न कोई दाता है
, न तपस्वी, न ज्ञानी , न त्यागी, न वक्ता है और न
ऐश्वर्यशाली।
भगवान शिव का एक नाम आशुतोषहै। आशुका अर्थ है अति
शीघ्र
, ‘तोषयानी प्रसन्न होने वाले। उपासना से शीघ्र ही
प्रसन्न होने के कारण उन्हें आशुतोष कहते है।
आज इस विडियो मे भगवान शिव और माता पार्वती से जुड़ी एक रोचक
कहानी सुनाएँगे...
ये काल चक्र है...
एक बार की बात है, देवी पार्वती का मन खोह और कंदराओं में रहते हुए ऊब गया। दो
नन्हें बच्चे और तरह तरह की असुविधाएँ। उन्होंने भगवान शंकर से अपना कष्ट बताया और
अनुरोध किया कि अन्य देवताओं की तरह अपने लिये भी एक छोटा सा महल बनवा लेना
चाहिये। शंकर जी को उनकी बात जम गई।
ब्रह्मांड के सबसे योग्य वास्तुकार विश्वकर्मा महाराज को
बुलाया गया। पहले मानचित्र तैयार हुआ फिर शुभ मुहूर्त में भूमि पूजन के बाद तेज
गति से काम शुरू हो गया। महल आखिर शंकर पार्वती का था कोई मामूली तो होना नहीं था।
विशालकाय महल जैसे एक पूरी नगरी
, जैसे कला की अनुपम कृति, जैसे पृथ्वी पर
स्वर्ग। निर्माता भी मामूली कहाँ थे! विश्वकर्मा ने पूरी शक्ति लगा दी थी अपनी
कल्पना को आकार देने में। उनके साथ थे समस्त स्वर्ण राशि के स्वामी कुबेर ! बची
खुची कमी उन्होंने शिव की इस भव्य निवास-स्थली को सोने से मढ़कर पूरी कर दी।
तीनों लोकों में जयजयकार होने लगी। एक ऐसी अनुपम नगरी का
निर्माण हुआ था जो पृथ्वी पर इससे पहले कहीं नहीं थी। गणेश और कार्तिकेय के आनंद
की सीमा नहीं थी। पार्वती फूली नहीं समा रही थीं
, बस एक ही चिंता
थी कि इस अपूर्व महल में गृहप्रवेश की पूजा का काम किसे सौंपा जाय। वह ब्राह्मण भी
तो उसी स्तर का होना चाहिये जिस स्तर का महल है। उन्होंने भगवान शंकर से राय ली।
बहुत सोच विचार कर भगवान शंकर ने एक नाम सुझाया- रावण।
समस्त विश्व में ज्ञान, बुद्धि, विवेक और अध्ययन
से जिसने तहलका मचाया हुआ था
, जो तीनो लोकों में आने जाने की शक्ति रखता था, जिसने निरंतर
तपस्या से अनेक देवताओं को प्रसन्न कर लिया और जिसकी कीर्ति दसों दिशाओं में
स्वस्ति फैला रही थी
, ऐसा रावण गृहप्रवेश की पूजा के लिये, श्रीलंका से, कैलाश पर्वत पर
बने इस महल में आमंत्रित किया गया। रावण ने आना सहर्ष स्वीकार किया और सही समय पर
सभी कल्याणकारी शुभ शकुनों और शुभंकर वस्तुओं के साथ वह गृहप्रवेश के हवन के लिये
उपस्थित हुआ।
गृहप्रवेश की पूजा अलौकिक थी। तीनो लोकों के श्रेष्ठ स्त्री
पुरुष अपने सर्वश्रेष्ठ वैभव के साथ उपस्थित थे। वैदिक ऋचाओं के घोष से हवा गूँज
रही थी
, आचमन से उड़ी जल की बूँदें वातावरण को निर्मल कर रही थीं।
पवित्र होम अग्नि से उठी लपटों में बची खुची कलुषता भस्म हो रही थी। इस अद्वितीय
अनुष्ठान के संपन्न होने पर अतिथियों को भोजन करा प्रसन्नता से गदगद माता पार्वती
ने ब्राह्मण रावण से दक्षिणा माँगने को कहा।
आप मेरी ही नहीं समस्त विश्व की माता है माँ
गौरा
, आपसे दक्षिणा कैसी?” रावण विनम्रता की प्रतिमूर्ति बन गया।

नहीं विप्रवर, दक्षिणा के बिना
तो कोई अनुष्ठान पूरा नहीं होता और आपके आने से तो समस्त उत्सव की शोभा ही
अनिर्वचनीय हो उठी है
, आप अपनी इच्छा से
कुछ भी माँग लें
, भगवान शिव आपको
अवश्य प्रसन्न करेंगे।
पार्वती ने आग्रह
से कहा।
आपको कष्ट नहीं देना चाहता माता, मैंने बिना माँगे ही बहुत कुछ पा लिया है। आपके
दर्शन से बढ़कर और क्या चाहिये मुझे
?” रावण ने और भी
विनम्रता से कहा।
यह आपका बड़प्पन है लंकापति, लेकिन अनुष्ठान की पूर्ति के लिये दक्षिणा
आवश्यक है आप इच्छानुसार जो भी चाहें माँग लें
, हम आपका पूरा मान
रखेंगे।
पार्वती ने पुनः अनुरोध किया।
संकोच होता है देवि।रावण ने आँखें झुकाकर कहा।
संकोच छोड़कर
यज्ञ की पूर्ति के विषय में सोचें विप्रवर।
पार्वती ने नीति को याद दिलाया।
जरा रुककर रावण ने कहा, “यदि सचमुच आप मेरी पूजा से प्रसन्न हैं, यदि सचमुच आप
मुझे संतुष्ट करना चाहती हैं और यदि सचमुच भगवान शिव सबकुछ दक्षिणा में देने की
सामर्थ्य रखते हैं तो आप यह सोने की नगरी मुझे दे दें।

पार्वती एक पल को भौंचक रह गईं ! लेकिन पास ही शांति से
बैठे भगवान शंकर ने अविचलित स्थिर वाणी में कहा- तथास्तु। रावण की खुशी का ठिकाना
न रहा। भगवान शिव के अनुरोध पर विश्वकर्मा ने यह नगर कैलाश पर्वत से उठाकर
श्रीलंका में स्थापित कर दिया।
तबसे ही रावण की लंका सोने की कहलाई और वह दैवी गुणों से
नीचे गिरते हुए सांसारिक लिप्सा में डूबता चला गया। पार्वती के मन में फिर किसी
महल की इच्छा का उदय नहीं हुआ। इस दान से इतना पुण्य एकत्रित हुआ कि उन्हें और
उनकी संतान को गुफा कंदराओं में कभी कोई कष्ट नहीं हुआ।
How did Ravan get golden
Lanka,
Who made Lanka of gold,
ravana and
shiva story,,
ravana and
shiva story in hindi
golden lanka
of ravana,
ravana asks
for parvati,
where is
ravana palace in sri lanka,
ravana
history,
ravana dead
body,
evidence of
ravana in sri lanka,

कलयुग में नारायणी सेना की वापसी संभव है ? The Untold Story of Krishna’s ...

क्या महाभारत युद्ध में नारायणी सेना का अंत हो गया ... ? या फिर आज भी वो कहीं अस्तित्व में है ... ? नारायणी सेना — वो ...