Sunday, 28 October 2018

क्या होता अगर वीर बर्बरीक और महाप्रतापी इंद्रजीत के बीच युद्ध होता || Ka...



        बरबरीक
और इंद्रजीत
जब जब पृथ्वी पर पाप का घड़ा भरने लगता है तब तब
ईश्वर धर्म की स्थापना के लिए जन्म लेते हैं और इसी से रचना होती है नए धार्मिक
ग्रंथ की जो युगो युगो तक मनुष्य को मार्गदर्शन देता है। महाभारत और रामायण भी ऐसे
ही ग्रंथ हैं जिसमे भारत के इतिहास के बारे मे विस्तार से लिखा गया है जो यह सिद्ध
करता है की भारत एक देश नहीं अपितु राष्ट्र है एक राष्ट्र जो जन्म नहीं लेता न
बनाया जाता है वो तो युगो युगो से यथावत है जिसमे संस्कृति बनती है धर्म बनाता है।
महाभारत और रामायण की कथाएँ हमे आज के जीवन मे कठिन से कठिन समस्याओं से बाहर
निकालने की प्रेरणा देती हैं। हम भली भाति जानते हैं की दोनों ही ग्रन्थों मे धर्म
युद्ध का वृतांत है और कुछ महान योद्धाओं का जिक्र आता है। दोस्तों हमने अपने
पिछले अध्यायों मे रामायण और महाभारत के कुछ महान पत्रों जैसे रावण और पितामह
भीष्म
, लक्ष्मण और अर्जुन, कुंभकर्ण और भीम जैसे पत्रों की
तुलना की है इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए आज हम महाभारत और रामायण से दो और महारथियों
की तुलना करेंगे॥ पहला है महाबली भीम के पौत्र बरबारीक और दूसरा है रावण का
महाप्रतापी पुत्र मेघनाद इंद्रजीत। आज इस विडियो मे दोनों ही योद्धाओ की विषताओं
और कमियों पर बात करेंगे और ये समझने का प्रयास करेंगे की कोन किससे बेहतर योद्धा
है।
ये काल चक्र है...
यहाँ एक तरफ हैं महाबली भीम के पौत्र और अतिबलशाली
घटोत्कच का पुत्र बरबरीक जिसकी शक्ति से प्रभावित होकर स्वम भगवान कृष्ण को  उसके समक्ष आना पड़ा और महाभारत युद्ध न लड़ने
देने के लिए युद्ध से पहले ही उन्होने अपने सुदर्शन से उसका सर काटना पड़ा। शक्ति
और सामर्थ्य का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है की बरबारीक के कटे सिर ने पूरा
महाभारत युद्ध देखा क्यूँ की भगवान कृष्ण ने उसे ऐसा वरदान दिया था।
तो दूसरी तरफ हैं देवताओं तक को उनके राज्य से
बेदखल कर उनके राजा इंद्रा को बंदी बना लेने वाले मेगनाद इंद्रजीत। उनके ताकत का
अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है की राम रावण युद्ध मे अपनी माया से उन्होने
लक्ष्मण तक को मूर्छित कर दिया।
 आइए दोनों
हीं योद्धाओं की विशेषताओं पर नजर डालते हैं और ये समझने का प्रयास करते हैं की इन
दोनों मे कोण अधिक श्रेष्ठ था।
पहला सिक्षा— इंद्रजीत के गुरु थे गुरु शुक्राचार्य
और बरबारीक के गुरु उनकी माता अहिलावती थी जो एक नागकन्या थीं। नैतिक सिक्षा के
आधार पर यहाँ बरबारीक जायदा मजबूत हैं।
अब आते उनके अस्त्र सस्त्र पर— इंद्राजीत के पास उस
वक़्त के तीनो ही महान अस्त्र ब्रह्मास्त्र वैष्णवास्त्र और पसुप्तास्त थे. और उसका
रथ भी एक अस्त्र की भांति शक्तिशाली था. 
इन्द्रजीत के पास नागपास अस्त्र भी था जिससे उसने लक्ष्मण तक को मुर्चित कर
दिया था परन्तु बरबारीक के अस्त्रों की बराबरी फिर भी नही की जा सकती है उसके पास
ऐसे तीन बान थे जिनसे वो समस्त सतरु सेन का विनाश कर सकता था। उसके एक बान की
काबलियत को देख कर स्वम भगवान कृष्ण को बरबारीक को युद्ध से अलग रखने के लिए उसका
शीश काटना पड़ा। महाभारत के सभी महारथियों
aur समस्त सैनिकों
का एक पल मे विनाश करने वाले बनो की तुलना किसी से संभव नहीं है। उन बनो के समक्ष
इंद्रजीत जैसा योद्धा भी छोटा प्रतीत होता है।
अब बात करते हैं बहुबल कीइन्द्रजीत एक मायावी योधा था उसने अपने माया से इंद्रा तक को पराजित कर
दिया था और उसी के बाद उसका नाम इन्द्रजीत पड़ा लक्ष्मण जैसे योद्धा को मूर्छित
करने वाला इंद्रजीत ही था। परंतु बरबारीक को भी कम नहीं आँका जा सकता है महाभारत
मे ही एक प्रसंग ऐसा भी आता है जब भूल वश एक बार बरबारीक का सामना अपने ही दादा
भीम से हो गया था तब भी बरबारीक अपने दादा से पराजित नही हुआ था ।
दोस्तों वरदान के नजरिए से देखा जाए तो जब बरबारीक
ने भगवान कृष्ण को अपना शीश दान स्वरूप दिया तब भगवान कृष्ण ने उसे ये वरदान दे
दिया की इस बलिदान को हमेशा याद रखा जाएगा और तुम्हारी पुजा मेरे ही एक रूप मे
युगों युगों तक होगी क्युकी बर्बरीक का शीश खाटू नगर में दफनाया गया था इसलिए
उन्हें खाटूश्याम जी कहते है। इधर इंद्राजीत उसे युद्ध में कोई भी पराजित नहीं कर
सकता है. यहाँ भी बरबरीक का वरदान इंद्रजीत के वरदान से श्रेस्ठ दिखता है।
दोस्तों वीर बरबारीक और महाप्रतापी इंद्रजीत के बीच
अगर युद्ध होता तो उसमे कौन वजई होता इसपर आप अपने विचार हमे कोमेंट बॉक्स मे
लिखकर बता सकते हैं विडियो पसंद आई है तो विडियो को लाइक जरुर करे और ऐसी ही
धार्मिक विदेओस देखने के लिए हमारे इस चैनल को सुब्स्कृबे जरूर करे । धन्यवाद।    

     

Thursday, 4 October 2018

सिर्फ एक ही युद्ध हारे थे हनुमान जी, जानिए कौन था वह योद्धा || Kaal Chakra



जिंदगी में एक ही युद्ध हारे थे हनुमान, जानिए कौन था वह
योद्धा !!
हनुमान सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ हैं। हनुमान के बगैर न तो
राम हैं और न रामायण। राम-रावण युद्ध में हनुमानजी ही एकमात्र अजेय योद्धा थे
जिन्हें कोई भी किसी भी प्रकार से क्षति नहीं पहुंचा पाया था। यूं तो हनुमानजी के
पराक्रम
, सेवा, दया और दूसरों का
दंभ तोड़ने की हजारों गाथाएं हैं लेकिन
आज हम पुरानो के माध्यम से ऐसे घटना को लेकर आए हैं जब
हनुमान जी को किसी भी युद्ध मे पहली बार हार का सामना करना पड़ा इतना ही नहीं इस
युद्ध में हनुमान जी को हराने वाला कोई और नहीं एक राम भक्त ही था... तो कौन था वह
योद्धा जिसने हनुमान जी को हरा दिया और उस युद्ध का इस पृथ्वी पर क्या प्रभाव
पड़ा...
?
ये काल चक्र है॥
दोस्तों किसी समय मे मच्छिंद्रनाथ
नाम के एक बहुत बड़े तपस्वी हुआ करते थें
, एक बार जब वो रामेश्वरम में आए तो भगवान राम द्वारा निर्मित
सेतु देख कर वे भावविभोर हो गए और प्रभु राम की भक्ति में लीन होकर वे समुद्र में
स्नान करने लगे। तभी वहां वानर वेश में उपस्थित हनुमान जी की नज़र उन पर पड़ी वो
जानते थे की मचींद्रनाथ जी कितने बड़े तपस्वी हैं फिर भी उन्होंने मच्छिंद्रनाथ जी
के शक्ति की परीक्षा लेनी चाही। इसलिए हनुमान जी ने अपनी लीला आरंभ की
, जिससे वहां जोरों की बारिश होने लगी, ऐसे में बानर रूपी हनुमान जी उस बारिश से बचने के लिए एक
पहाड़ पर वार कर गुफा बनाने की कोशिश का स्वांग करने लगे। दरअसल उनका उद्देश्य था
कि मच्छिंद्रनाथ का ध्यान टूटे और उन पर नज़र पड़े और वहीं हुआ मच्छिंद्रनाथ ने
तुरंत सामने पत्थर को तोड़ने की चेष्टा करते हुए उस वानर से कहा
, ‘हे वानर तुम क्यों ऐसी मूर्खता कर रहे हो, जब प्यास लगती है तब कुआं नहीं खोदा जाता, इससे पहले ही तुम्हें अपने घर का प्रबंध कर लेना चाहिए था।
 ये सुनते ही वानर रूपी हनुमान जी ने
मच्छिंद्रनाथ से पूछा
, आप कौन हैं?
जिस पर मच्छिंद्रनाथ ने स्वयं
का परिचय दिया
मैं एक सिद्ध योगी हूं
और मुझे मंत्र शक्ति प्राप्त है।
जिस पर हनुमान जी ने
मच्छिंद्रनाथ की शक्ति की परीक्षा लेने के उद्देश्य से कहा
, वैसे तो प्रभु श्रीराम और महाबली हनुमान से श्रेष्ठ योद्धा
इस संसार में कोई नहीं है
, पर कुछ समय
उनकी सेवा करने के कारण
, उन्होंने
प्रसन्न होकर अपनी शक्ति का कुछ प्रतिशत हिस्सा मुझे भी दिया है
, ऐसे में अगर आप में इतनी शक्ति है और आप पहुंचे हुए सिद्ध
योगी है तो मुझे युद्ध में हरा कर दिखाएं
, तभी मैं आपके तपोबल को सार्थक मानूंगा, अन्यथा स्वयं को सिद्ध योगी न कहें।
यह सब सुनकर मच्छिंद्रनाथ जी ने
उस वानर की चुनौती स्वीकार कर ली और युद्ध की शुरुआत हो गई। जिसमें वानर रुपी
हनुमान जी ने मच्छिंद्रनाथ पर एक-एक करके कई बड़े पर्वत फेंके
, पर इन पर्वतों को अपनी तरफ आते देख मच्छिंद्रनाथ ने अपनी
मंत्र शक्ति का प्रयोग किया और उन सभी 
पर्वतों को हवा में स्थिर कर उन्हें उनके मूल स्थान पर वापस भेज दिया। इतना
देखते ही महाबली को क्रोध आया उन्होनें मच्छिंद्रनाथ पर फेंकने के लिए वहां
उपस्थित सबसे बड़ा पर्वत अपने हाथ में उठा लिया। जिसे देखकर मच्छिंद्रनाथ ने
समुंद्र के पानी की कुछ बूंदों को अपने हाथ में लेकर उसे वाताकर्षण मंत्र से सिद्ध
कर उन पानी की बूंदों को हनुमान जी के ऊपर फेंक दिया।
इन पानी की बूंदों का स्पर्श
होते ही हनुमान के शरीर मे अजीब सी हलचल हुई  और एकदम से स्थिर हो गया
, साथ ही उस मंत्र की शक्ति से कुछ क्षणों के लिए हनुमान जी
की शक्ति छिन्न गई और ऐसे में वे उस पर्वत का भार न उठा पाने के कारण तड़पने लगे।
तभी हनुमान जी का कष्ट देख उनके पिता वायुदेव वहां प्रगट हुए और मच्छिंद्रनाथ से
हनुमान जी को क्षमा करने की प्रार्थना की। वायुदेव की प्रार्थना सुन मच्छिंद्रनाथ
ने हनुमान जी को मुक्त कर दिया और हनुमान जी अपने वास्तविक रुप में आ गए। इसके बाद
उन्होंने मच्छिंद्रनाथ से कहा
हे
मच्छिंद्रनाथ
, मैं आपको भलीभांति जानता
था
,
फिर भी मैं आपकी शक्ति की परीक्षा लेने की प्रयास कर बैठा, इसलिए आप मेरी इस भूल को माफ करें। ये सुनकर और स्थिति को
समझते हुए मच्छिंद्रनाथ जी ने हनुमान जी को माफ़ कर दिया।
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कलयुग में नारायणी सेना की वापसी संभव है ? The Untold Story of Krishna’s ...

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