बात उस समय की है जब पर्वत राज हिमालय की पुत्री
पार्वती भगवान शिव को पति रूप मे पाने के लिए कठोर तपस्या कर रहीं थीं । तपस्या के
अंत मे ब्रह्मा जी ने उन्हे ये आस्वास्न दिया कि भगवान शिव तुम्हें पति रूप मे
अवस्य प्राप्त होंगे । इसी क्रम मे एक दिन जब पार्वती जी भगवान शिव के चिंतन मे
लिन थीं तभी उन्हे एक बालक कि करुणा भरी पुकार सुनाई पड़ी । समीप जा कर देखा तो ये
पता चला कि उस बालक को एक ग्राह ने पकड़ रखा है और वो बालक बस पानी मे डूबने ही वाला था । जब जब ग्राह उसे खींचता
तब तब उसका क्रंदन और बढ़ जाता । पार्वती जी दौड़ कर उस ग्राह के समीप पहुँचीं और
उससे प्रार्थना के स्वर मे बोला—ग्राहराज मै आपको नमस्कार करती हूँ, कृपा कर के तुम इस बालक को छोड़ दो ।
पार्वती भगवान शिव को पति रूप मे पाने के लिए कठोर तपस्या कर रहीं थीं । तपस्या के
अंत मे ब्रह्मा जी ने उन्हे ये आस्वास्न दिया कि भगवान शिव तुम्हें पति रूप मे
अवस्य प्राप्त होंगे । इसी क्रम मे एक दिन जब पार्वती जी भगवान शिव के चिंतन मे
लिन थीं तभी उन्हे एक बालक कि करुणा भरी पुकार सुनाई पड़ी । समीप जा कर देखा तो ये
पता चला कि उस बालक को एक ग्राह ने पकड़ रखा है और वो बालक बस पानी मे डूबने ही वाला था । जब जब ग्राह उसे खींचता
तब तब उसका क्रंदन और बढ़ जाता । पार्वती जी दौड़ कर उस ग्राह के समीप पहुँचीं और
उससे प्रार्थना के स्वर मे बोला—ग्राहराज मै आपको नमस्कार करती हूँ, कृपा कर के तुम इस बालक को छोड़ दो ।
इसपर ग्राह ने उनसे कहा- छठवें दिन जो भी प्राणी मेरे पास आता है
मै उसे खा जाता हूँ विधाता ने मेरे आहार का यही नियम बनाया है । आज यह बालक मेरे
समीप आया है तो आप ही बताओ भला मै इसे कैसे छोड़ सकता हूँ । माता पार्वती ने कहा—
ग्राहराज इस बालक के बदले मै तुम्हें अपनी तपस्या का पुण्य देती हूँ तुम इस बालक
को छोड़ दो ।
मै उसे खा जाता हूँ विधाता ने मेरे आहार का यही नियम बनाया है । आज यह बालक मेरे
समीप आया है तो आप ही बताओ भला मै इसे कैसे छोड़ सकता हूँ । माता पार्वती ने कहा—
ग्राहराज इस बालक के बदले मै तुम्हें अपनी तपस्या का पुण्य देती हूँ तुम इस बालक
को छोड़ दो ।
यह सुनकर ग्राह शांत हुआ और बोला ठीक है अगर आप
अपनी पूरी कि पूरी तपस्या मुझे दे दो तो मै इसे छोड़ दूंगा ।
अपनी पूरी कि पूरी तपस्या मुझे दे दो तो मै इसे छोड़ दूंगा ।
करुणामयी माँ ने तुरंत ही संकल्प ले कर अपनी पूरी
तपस्या ग्राह को दे दी । तपस्या का फल पा कर वह ग्राह सूर्य कि तरह चमक उठा। उसने
कहा – हे देवी आप अपनी तपस्या वापिस ले लो । मै आपके कहने मात्र से ही इस बालक को
छोड़ देता हूँ परंतु पार्वती जी ने उसका कहना नहीं माना । ग्राहराज ने देवी कि खूब
प्रसंसा की और वहाँ से चला गया ।
तपस्या ग्राह को दे दी । तपस्या का फल पा कर वह ग्राह सूर्य कि तरह चमक उठा। उसने
कहा – हे देवी आप अपनी तपस्या वापिस ले लो । मै आपके कहने मात्र से ही इस बालक को
छोड़ देता हूँ परंतु पार्वती जी ने उसका कहना नहीं माना । ग्राहराज ने देवी कि खूब
प्रसंसा की और वहाँ से चला गया ।
उस बालक ने
अंसुभरी नेत्रो से देवी पार्वती की ओर देखकर कृतज्ञता प्रकट की । माता
पार्वती ने दुलार पूछकर कर उस बालक को वहाँ से विदा किया । बालक को बचाकर माता
पार्वती बहुत संतुस्ट थीं अपने आश्रम मे आकार वो पुनः तपस्या मे लिन हो गईं की तभी
भगवान शिव वहाँ आ गए और बोले – हे कल्याणी अब तुम्हें तपस्या करने की जरूरत नहीं
है तुमने अपनी तपस्या मुझे ही अर्पित की है वह अन्नतगुना होकर तुम्हारे लिए अक्षय हो
गई है ।
अंसुभरी नेत्रो से देवी पार्वती की ओर देखकर कृतज्ञता प्रकट की । माता
पार्वती ने दुलार पूछकर कर उस बालक को वहाँ से विदा किया । बालक को बचाकर माता
पार्वती बहुत संतुस्ट थीं अपने आश्रम मे आकार वो पुनः तपस्या मे लिन हो गईं की तभी
भगवान शिव वहाँ आ गए और बोले – हे कल्याणी अब तुम्हें तपस्या करने की जरूरत नहीं
है तुमने अपनी तपस्या मुझे ही अर्पित की है वह अन्नतगुना होकर तुम्हारे लिए अक्षय हो
गई है ।
आज का श्लोका ज्ञान :
परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः परोपकाराय वहन्ति नद्यः ।
परोपकाराय दुहन्ति गावः परोपकारार्थ मिदं शरीरम् ॥
अर्थात : परोपकार के लिए वृक्ष फल देते हैं, नदीयाँ परोपकार के लिए ही बहती हैं और गाय परोपकार के लिए दूध देती हैं,
(अर्थात्) यह शरीर भी परोपकार के लिए ही है ।
(अर्थात्) यह शरीर भी परोपकार के लिए ही है ।
No comments:
Post a Comment