हनुमान और पारसुरम जी युद्ध
कल्पना कीजिए... एक ऐसा युद्ध,
जहां दो अमर योद्धा आमने-सामने खड़े हैं।
एक
तरफ परशुराम जी… भगवान विष्णु के छठे अवतार, जिनके क्रोध से धरती के सबसे बड़े योद्धा तक कांप उठते थे।"
"और दूसरी तरफ… पवनपुत्र हनुमान, जिनकी शक्ति का कोई पार नहीं… जिनकी भक्ति से स्वयं भगवान राम भी प्रसन्न होते हैं।"
"लेकिन सोचिए… जब ये दो दिव्य शक्तियाँ आमने-सामने आईं, तो क्या हुआ होगा?"
"क्या हुआ ऐसा, जिसने परशुराम जैसे तपस्वी को क्रोधित कर दिया?"
"और हनुमान जी… जिनकी विनम्रता के आगे बड़े-बड़े ऋषि भी नतमस्तक होते थे—आखिर क्यों उन्होंने भी युद्ध का प्रण ले लिया?"
"लेकिन क्या ये केवल एक साधारण युद्ध था? या फिर इसके पीछे छुपा था एक ऐसा रहस्य, जो सदियों तक लोगों से छिपा रहा?"
"इस टकराव की सच्चाई जानेंगे तो… आपकी सोच ही बदल जाएगी!
त्रेतायुग का समय था। धरती पर एक अत्याचारी था – सहस्त्रार्जुन। उसके आतंक से पूरी पृथ्वी थर्रा उठी थी। अहंकार इतना कि वह ऋषियों तक को नहीं छोड़ता। एक दिन... वो भगवान पारसुरम के पिता महर्षि जमदग्नि के आश्रम पहुँचा। तप में लीन महर्षि को उसने क्रूरता से मार डाला। लेकिन... उसकी क्रूरता यहीं नहीं रुकी!उसने परशुराम जी के चारों भाइयों की भी हत्या कर दी। जब माता रेणुका ने
अपने पुत्र परशुराम को याद किया, तब तक बहुत देर हो
चुकी थी।
परशुराम जी जब आश्रम पहुंचे तो अपने
परिवार को मृत देखकर… उनका क्रोध सातवें आसमान
पर था। उन्होंने प्रतिज्ञा ली—
"जब-जब धरती पर अधर्मी और अन्यायी
क्षत्रिय जन्म लेंगे, मैं उनका विनाश करूंगा!" और इसी
प्रतिज्ञा के तहत उन्होंने सहस्त्रार्जुन का वध कर दिया…
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती! परशुराम
जी ने क्रोध में आकर बीस बार पृथ्वी को क्षत्रियविहीन कर दिया।
लेकिन जब 21बार क्षत्रियों का संहार कर
रहे थे,
कुछ राजा जान बचाकर जंगल में जा छिपे। वहीं... हनुमान जी तपस्या में
लीन थे। डरे हुए उन राजाओं ने हनुमान जी से रक्षा की गुहार लगाई—
"प्रभु! किसी और के पाप की सजा
हमें क्यों मिल रही है?"
हनुमान जी ने उन्हें आश्वासन दिया—
"जब तक मैं हूँ, तुम्हें कोई छू भी नहीं सकता।"
और तब शुरू हुआ वो टकराव,
जिसे पूरी सृष्टि ने देखा। जब परशुराम जी उन राजाओं की तलाश में
पहुँचे, तो उनके सामने हनुमान जी खड़े थे।
हनुमान जी ने विनम्रता से पूछा—
"हे ऋषिवर, आप
इन निर्दोष राजाओं का संहार क्यों करना चाहते हैं?"
परशुराम जी ने तीखे स्वर में कहा—
"हे वानर! तुम कौन हो, जो मेरे मार्ग में बाधा डाल रहे हो?"
हनुमान जी ने उत्तर दिया—
"मैंने इनकी रक्षा का वचन दिया है।
यदि आपको इन्हें मारना है, तो पहले मुझे हराना होगा।"
और… यही वो
क्षण था, जब दो महान योद्धाओं के बीच भयानक युद्ध शुरू हो
गया!
धरती काँप उठी…
आकाश गूंज उठा… हनुमान जी ने अपनी गदा से
आक्रमण किया, परशुराम जी ने अपने परशु (फरसे) से जवाब दिया। एक
प्रहार से पर्वत हिल गए, पेड़ उखड़ गए… दोनों की शक्ति इतनी प्रचंड थी कि चारों दिशाएँ अंधकारमय हो गईं। हनुमान
जी का हर प्रहार आंधी की तरह था, और परशुराम जी के फरसे की
चमक से आकाश जल उठा। युद्ध इतना भयंकर था कि स्वयं देवता भी भयभीत हो गए।
लेकिन तभी… एक
चमत्कार हुआ! महादेव शिव स्वयं युद्धभूमि में प्रकट हुए।
उनकी दिव्य उपस्थिति से चारों ओर शांति छा
गई।
भगवान शिव ने दोनों को शांत करते हुए कहा—
"हे परशुराम! हनुमान केवल शक्ति ही
नहीं, भक्ति का प्रतीक हैं। और हनुमान, परशुराम केवल योद्धा ही नहीं, धर्म रक्षक हैं।"
महादेव ने परशुराम जी को उनके कर्तव्य की
याद दिलाई और हनुमान जी को उनकी तपस्या की महानता बताई।
हनुमान जी और परशुराम जी ने एक-दूसरे का
सम्मान करते हुए अपना क्रोध त्याग दिया।
इस तरह, वो
भयानक युद्ध समाप्त हुआ। लेकिन ये कथा हमें याद दिलाती है—
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