Thursday, 17 January 2019

महारथी कर्ण महाभारत का एक महायोद्धा .... Kaal Chakra



     
कर्ण
कर्ण की छवि आज भी भारतीय जनमानस में एक
ऐसे महायोद्धा की है जो जीवनभर प्रतिकूल परिस्थितियों से लड़ता रहा। कर्ण को एक
दानवीर और महान योद्धा माना जाता है। 
पाण्डवों के वनवास के दौरान
, कर्ण,
दुर्योधन को पृथ्वी का सम्राट बनाने का कार्य अपने हाथों में लेता
है। कर्ण द्वारा देशभर में सैन्य अभियान छेड़े गए और उसने राजाओं को परास्त कर
उनसे ये वचन लिए की वह हस्तिनापुर महाराज दुर्योधन के प्रति निष्ठावान रहेंगे
अन्यथा युद्धों में मारे जाएगें। कर्ण सभी लड़ाईयों में सफल रहा। महाभारत में
वर्णन किया गया है कि अपने सैन्य अभियानों में कर्ण ने कई युद्ध छेड़े और असंख्य
राज्यों और साम्राज्यों को आज्ञापालन के लिए विवश कर दिया जिनमें हैं - कम्बोज
,
शक, केक‍य, अवन्तय,
गन्धार, माद्र, त्रिगत,
तंगन, पांचाल, विदेह,
सुह्मस,  वांग, निशाद, कलिंग, वत्स, अशमक, ऋषिक और बहुत से
अन्य राज्य भी हैं।
इतनी प्रतिभा इतना शौर्य होने के बावजूद कारण को महाभारत की कहानी मे बार बार अपमानित होना पड़ा वो भी सिर्फ इस लिए क्यूँ की उसका लालन पालन एक सूत परिवार मे हुआ था। एक नीचे कुल का होने के कारण कर्ण को कब कब  नीचा दिखाया गया आज हम इस विडियो मे इसी विषय पर बात करेंगे।
ये काल चक्र है....   
जब कर्ण गुरु द्रोण पास धनुर्विद्या प्रपट करने जाते हैं तब गुरु द्रोण उसे यह कह कर माना कर देते हैं की धनुर्विद्या सूत पुत्रों के लिए नहीं बनी है। वो कहते हैं की उचया विद्या पर केवल क्षत्रियों का अधिकार होता है।  तब कर्ण उनसे कहते हैं मै क्षत्रियों की भाति आपसे राज्य नहीं मांग रहा हूँ मै तो विद्या का अभिलाषी हूँ.... और अगर ऐसा है तो आपने विद्या क्यूँ प्राप्त की और आप अपने पुत्र को विद्या क्यूँ प्रदान कर रहे हैं। कर्ण कहते हैं की धनुष पर तो केवल उसका अधिकार होता है जो उस प्रत्यंचा चढ़ा सकता हैं मै नहीं मानता उस वायवस्था को जो मुझसे मेरा धनुष छीनने का प्रयास करे। गुरु द्रोण क्रोध्त होकर कर्ण को वहाँ से जाने को कहते हैं कर्ण कहते हैं मै जा रहा हूँ परंतु जब लौटूँगा तो भारत वर्ष का श्र्व्श्रेस्थ धनुर्धर बनकर लौटूँगा
और हुआ भी यही इसका वर्णन हमे पांडवों और कौरवों के प्रतोगीता स्थल पर मिलता है 
जब कर्ण ने क्रीडा स्थल पर आकर
अपने हुनर दिखाए
, तो भीम  ने तत्काल हस्तक्षेप किया और कहा,
‘यह आदमी क्षत्रिय नहीं है। कौन हो तुम? इस
प्रतियोगिता में घुसने की तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई
?’ भीम
खड़ा होकर बोला
, ‘तुम किसके पुत्र हो? अभी
बताओ
?’ अचानक आत्मविश्वास से भरपूर उस युवक कर्ण का, जो खुद को अर्जुन से बेहतर धनुर्धर समझता था, उसका
आत्मविश्वास डगमगा गया। जब उन्होंने पूछा
, ‘तुम्हारे पिता
कौन हैं
?’ तो वह बोला, ‘मेरे पिता
अधिरथ हैं।’ फिर वे लोग बोले
, ‘अरे, तुम
तो सूत पुत्र हो! और तुम इस मैदान में दाखिल हो गए। जाओ यहां से। यह क्षत्रियों के
लिए है।’
दुर्योधन को अपने जीवन का सबसे महान अवसर
ठीक अपने सामने दिखाई दे रहा था और वह उससे चूकना नहीं चाहता था। उसकी सबसे बड़ी
चिंता यह थी कि उसके भाइयों में कोई धनुर्धर नहीं था। उसे विश्वास था कि एक दिन वह
भीम को हरा देगा और उसके कुछ भाई नकुल और सहदेव को मार डालेंगे
,
एक दिन वे सिर्फ धर्म पर प्रवचन देकर युधिष्ठिर को हरा देंगे। मगर
उसे अर्जुन की चिंता थी
, क्योंकि उसके टक्कर का धनुर्धर उनके
पास नहीं था। इसलिए जब उसने कर्ण को और उसकी काबिलियत को देखा
, तो उसने तत्काल उसे लपक लिया। उसने खड़े होकर कर्ण की ओर से राजा से
प्रार्थना की। बोला
, ‘पिताजी, ऐसा कैसे
हो सकता है
? शास्त्रों के अनुसार एक आदमी तीन तरीकों से राजा
बन सकता है – या तो वह राजा का पुत्र हो या फिर उसने अपने हुनर और साहस से किसी
राजा को परास्त किया हो या फिर खुद कोई राज्य खड़ा किया हो।’कर्ण अभी यहीं है। अगर
अर्जुन उससे इसलिए नहीं लड़ना चाहता क्योंकि कर्ण राजा नहीं है
, तो मैं उसे राजा बना देता हूं।दूर देश में अंग नामक हमारा एक छोटा सा
राज्य है। वहां कोई राजा नहीं है। मैं कर्ण को अंग देश का राजा बनाता हूं।’ उसने
एक पुजारी बुलवाकर उसी जगह कर्ण का राज्याभिषेक कर दिया। ‘यह अंगराज है
, अंग का राजा। अर्जुन किसी के जन्म का बहाना लेकर नहीं बच सकता। मुझे परवाह
नहीं है कि इसके पिता कौन हैं। मैं इसे अपना मित्र स्वीकार करता हूं।’ उसने कर्ण
को गले लगाकर कहा
, ‘तुम मेरे भाई हो और अब से एक राजा।’कर्ण
अभिभूत था क्योंकि उसे अपने पूरे जीवन अपने नीचे कुल के कारण भेदभाव का सामना करना
पड़ा था। यहां एक राजा का बेटा उसके लिए खड़ा हुआ
, उसे गले
लगाया और उसे राजा बना दिया। उसकी वफादारी ने उसे जीवन भर के लिए बांध दिया। आप
देखेंगे कि यह बेवजह की वफादारी समय के साथ कई बार बहुत खतरनाक मोड़ ले लेगी। इस
प्रतियोगिता के बाद कर्ण एक राजा और दुर्योधन के मित्र की तरह महल में दाखिल हुआ।
कर्ण का अपमान द्रोपदी स्व्यंवर मे
कर्ण, द्रौपदी
के स्वयंवर में एक विवाह-प्रस्तावक था। अन्य प्रतिद्वन्दियों के विपरीत
, कर्ण धनुष को मोड़ने और उस पर प्रत्यंचा चढ़ा पाने में समर्थ था, पर जैसे ही वह लक्ष्य भेदन के लिए तैयार हुआ, द्रौपदी
ने कर्ण को सूत-पुत्र बोलकर उसे ऐसा करने से रोक दिया।
इन सब अपमानों के बावजूद कर्ण साहसिक आत्मबल युक्त एक ऐसा महानायक था जो अपने जीवन की प्रतिकूल स्थितियों से जूझता रहा। विशेष रूप से कर्ण अपनी दानप्रियता के लिए प्रसिद्ध है। कर्ण को कभी भी वह नहीं मिला जिसका वह अधिकारी था, पर उसने कभी भी प्रयास करना नहीं छोड़ा। भीष्म और भगवान कृष्ण सहित कर्ण के समकालीनों ने यह स्वीकार किया है कि कर्ण एक पुण्यात्मा है जो बहुत विरले ही मानव जाति में प्रकट होते हैं। वह संघर्षरत मानवता के लिए एक आदर्श है कि मानव जाति कभी भी हार ना माने और सदैव प्रयासरत रहे।
स्कम्भे लोका:  स्कम्भे तप: स्कम्भेऽध्यृतमाहितम्।
स्कम्भ त्वा वेद प्रत्यक्षम्,
इन्द्रे सर्वं समाहितम्।।
अर्थात- संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार
परमात्मा है। उसमें ही सारे लोक
, तप और प्राकृतिक नियम
रहते हैं। उस परमात्मा का साक्षात्कार करना
, अनुभूति करना ही
हमारा परम लक्ष्य है। ऐसा होने पर हम परमानंद की प्राप्ति करते हैं।
maharathi karna,
maharathi karna episode 53,
maharathi karna song,
maharathi karn all episodes,
maharathi karna arjun yudh,
maharathi karna arjun vs karna,
maharathi karna arjun ka yudh,
maharathi karna arjun,
maharathi karna all episode download,
maharathi karna hindi serial,
maharathi karna history,
maharathi karna hd video,
maharathi karna hindi

Friday, 28 December 2018

सुयोधन कैसे बना 'दुर्योधन' महाभारत का काला सच... || Kaal Chakra

        सुयोधन कैसे बना 'दुर्योधन'

'दुर्योधन' या 'सुयोधन', जिसके इर्द-गिर्द ही अधर्म ने और उसके नेत्रहीन पिता ने अपनी विजय का ताना बाना बुना था, महाभारत का मुख्य पात्र था. दुर्योधन का अहंकार भाव ही इस युद्ध की कटु परिणति का मुख्य कारण था। दुर्योधन अंत तक भी वासुदेव कृष्ण की धर्म स्थापना में आसक्ति को नहीं समझ पाया और अपने भाई-बान्धवों का समूल नाश करवा बैठा पर क्या दुर्योधन का इस परिदृश में उपस्थित होनाऔर    उसकी अनीति ही महाभारत के विनाशकारी समर का कारण था? शायद नहीं दुर्योधन को ही सिर्फ दोष देना ऐसा ही होगा जैसा दीये की कालिख के लिए केवल लौ को ही दोष देना और कालिख में तेल की भूमिका को नगण्य मानना पर जो भी हो, दुर्योधन के नियमपूर्ण अधर्म और वासुदेव कृष्ण के नियमहीन धर्म के परस्पर युद्ध में धर्म का ही पलड़ा भारी रहा और इसी विजय ने इस महाभारत को 'धर्मग्रन्थ' का दर्जा दे दिया। आईये दोस्तों दुर्योधन के कुछ पहलुओं पर नजर डालते हैं और ये समझने का प्रयास करते हैं की क्या वाकई दुर्योधन कभी सुयोधन था?
ये काल चक्र है... 
दुर्योधन का जन्म माता गांधारी की कोख से हस्तिनापुर के महल में हुआ पर जन्म से ही वह बालक विवादों और महत्वाकांक्षाओं की बलि चढ़ गया  यह बहुत कम लोग जानते हैं कि दुर्योधन का असली नाम ‘सुयोधन’ था  सुयोधन का अर्थ है भीषण आघातों से युद्ध करने वाला पर बालक सुयोधन पर पिता की राजगद्दी की महत्वाकांक्षा और मामा के हस्तिनापुर के विनाश के मंसूबों ने विपरीत प्रभाव डाला। जब पांडव पुत्र माता कुंती के साथ वन से हस्तिनापुर आए तब सुयोधन को इन पांच पांडवों को देखकर क्रोध और प्रतिस्पर्धा की भावना का अनुभव हुआ और वह मन ही मन उन ऋषि वेशधारी पांडव पुत्रों से घृणा करने लगा पर जब उसे युधिष्ठिर के भावी राजा बनने के बारे में पता चला तब वह कुंठा से भर उठा क्योंकि जिस राजप्रासाद को वह बचपन से स्वयं की सम्पत्ति समझ कर बैठा था उसे ये पांडव छीन सकते थे बस यहीं से सुयोधन से 'दुर्योधन' का जन्म हुआ और उसने पांडव पुत्रों को अपने मामा शकुनी की सहायता से समाप्त करने की कोशिशें शुरू कर दी। 

लेकिन यहां सवाल यह उठता है कि क्या महाभारत में दुर्योधन ही एकमात्र ऐसा व्यक्ति था, जिसने छल का साथ दिया हो? वस्तुतः दुर्योधन पांडवों को राजसिंहासन का असली उत्तराधिकारी नहीं समझता था क्योकि धृतराष्ट्र, पांडू से बड़ा था पर नेत्रहीन होने के कारण उसे राजा नहीं बनाया गया परन्तु अब वह कुरुकुल के ज्येष्ठ पुत्र धृतराष्ट्र का ज्येष्ठ पुत्र था अतः वह स्वयं को ही युवराज समझता था और अब चुंकि उसके पिता तख़्त पर आसीन थे तब वह युवराज बनने के सपने आंखों में संजोये बैठा था साथ ही वह पांडवों को पांडू के असली पुत्र नहीं मानता था क्योंकि पांडव 'योग' से उत्पन्न हुए थे और पांडू उनके जैविक पिता नहीं थे लेकिन जैसा कि नियम था कि राजा का पुत्र ही राजा बन सकता है अतः युधिष्ठिर ही तख़्त का असली वारिस था और साथ ही युधिष्ठिर ज्येष्ठ कुरु पुत्र था.  वह गदा युद्ध में संसार का महानतम और अद्वितीय योद्धा था। यहां तक स्वयं यदुवंशी बलराम, जो कि भीम और दुर्योधन दोनों के गुरु थे, भी दुर्योधन को सर्वश्रेष्ठ गदाधारी मानते थे। उसमें बेशक बल तो भीम से कम था परन्तु चपलता आकाशीय बिजली के सामान थी। उसकी इन्हीं क्षमताओं के फलस्वरूप अनेक राजा महाभारत युद्ध में उसके सहगामी बने. जब भीम और दुर्योधन का गदायुद्ध चल रहा था तब गांधारी के सतीबल और दुर्योधन के कड़े व्यायाम के फलस्वरूप, दुर्योधन लोहे के समान कठोर हो गया पर उसका जंघा इतना कठोर नहीं था। इस भीषण महायुद्ध में भीम की पराजय होती दिख रही थी। चुंकि दुर्योधन के सभी सम्बन्धी मारे जा चुके थे अतः वह राज्य लेने का इच्छुक नहीं था पर भीम से जीतना उसका परम लक्ष्य बन चुका था। इस स्थिति में भीम थकने और हारने लगा तब माधव कृष्ण भीम को दुर्योधन की जंघा तोड़ने के प्रतिज्ञा याद दिलवाई। भीम ने युद्ध के नियमों के विपरीत दुर्योधन की जंघा पर प्रहार किया और वह महावीर लड़ाका दुर्योधन भूमि पर गिर पड़ा। नियमों के मुताबिक गदा युद्ध में पेट से नीचे प्रहार वर्जित था पर जिन मर्यादाओं को दुर्योधन ने जीवनभर तोड़ा उन्हीं मर्यादाओं को तोड़कर दुर्योधन को भूमि पर मरणासन्न अवस्था में गिरा दिया गया और उसे अपने अनैतिक कार्यो को याद करने के लिए वहीं छोड़ दिया गया। 
दुर्योधन, युधिष्ठिर की तुलना में नैतिक रूप से पतित था और उसके राजा रहते पृथ्वी पर 'धर्मराज्य' की स्थापना असंभव थी और धर्म की स्थापना ही योगेश्वर कृष्ण का परम लक्ष्य था अतः पांडवों का साम्राज्य ही मधुसूदन के लक्ष्य को पूर्ण कर सकता था।

  यथा चतुर्भिः कनकं परीक्ष्यते निर्घषणच्छेदन तापताडनैः।
 तथा चतुर्भिः पुरुषः परीक्ष्यते त्यागेन शीलेन गुणेन कर्मणा।।
 भावार्थ :
घिसने, काटने, तापने और पीटने, इन चार प्रकारों से जैसे सोने का परीक्षण होता है, इसी प्रकार त्याग, शील, गुण, एवं कर्मों से पुरुष की परीक्षा होती है ।

सुयोधन meaning,

सुयोधन कौन था,

सुयोधन किसका नाम है,

दुर्योधन को शाप,

दुर्योधन का जन्म कैसे हुआ,

दुशासन के पुत्र का क्या नाम था,

धृतराष्ट्र,

युधिष्ठिर का चरित्र चित्रण,
suyodhana poem,

duryodhan ka janam kaise hua,

character of duryodhana in mahabharata in hindi,

duryodhana wife and karna,

duryodhana story in kannada,

duryodhana brother name,

duryodhan vadh,

suyodhana drama,

Saturday, 15 December 2018

महाभारत के बाद सुदर्शन चक्र का क्या हुआ ??....Kaal Chakra

                         सुदर्शन चक्र

महाभारत के युद्ध मे भगवान  कृष्ण ने शस्त्र नहीं उठाया क्यूँ की वो जानते थे अगर उन्होने शस्त्र उठा लिया तो उनके सामने कोई टीक नहीं पाएगा सभी मारे जाएंगे कृष्ण  चाहते थे की दोनों पक्षों को बराबर मौका मिलना चाहिए। परंतु कृष्ण के पास ऐसी कौन सी शक्ति जिससे वो एक पल मे ही युद्ध  की संपति कर सकते थे वो था भगवान कृष्ण का सुदर्शन चक्र। कहते हैं कि सुदर्शन चक्र एक ऐसा अचूक अस्त्र था कि जिसे छोड़ने के बाद यह लक्ष्य का पीछा करता था और उसका काम तमाम करके वापस छोड़े गए जाता है। सुदर्शन चक्र शत्रु पर चलाया  नहीं जाता यह प्रहार करने वाले की इच्छा शक्ति से भेजा जाता है| यह चक्र किसी भी चीज़ को खत्म करने की क्षमता रखता है| आइये जानते हैं महाभारत युद्ध के बाद सुदर्शन चक्र कहा गया? क्या कभी हमे इसकी शक्ति का अंदाज़ा हो पाएगा? कहाँ है सुदर्शन चक्र ?
ये काल चक्र है ॥ 
 महाभारत में सुदर्शन चक्र के विषय मे उल्लेख है कि अत्यन्त शक्तिशाली चक्र  से एक शक्ति – युक्त अस्त्र प्रक्षेपित किया गया…धुएँ के साथ अत्यन्त चमकदार ज्वाला, जिस की चमक दस हजार सूर्यों के चमक के बराबर थी, का अत्यन्त भव्य स्तम्भ उठा…वह वज्र के समान अज्ञात अस्त्र साक्षात् मृत्यु का भीमकाय दूत था जिसने वृष्ण और अंधक के समस्त वंश को भस्म करके राख बना दिया…उनके शव इस प्रकार से जल गए थे कि पहचानने योग्य नहीं थे. उनके बाल और नाखून अलग होकर गिर गए थे… यह चक्र एक पूरी सेना को सम्पत करने की क्षमता रखता था। 
पुरानो मे बताया गया है की भगवान विश्वकर्मा ने सूर्य के तेज़ से तीन चीजों का निर्माण किया पुष्पक विमान त्रिसुल और सुदर्शन चक्र। परंतु यहाँ सवाल यह उठता है की महाभारत के बाद सुदर्शन चक्र का क्या हुआ इसका उत्तर हमे भविष्य पुराण मे मिलता है उसमें लिखा गया है की जब भगवान कृष्ण ने देह त्याग किया तब सुदर्शन चक्र वहीं उसी जगह मिट्टी मे दफन हो गया और इस कलयुग मे जब भगवान विष्णु फिर से कल्कि रूप धरण करके वापिस इस पृथ्वी पर आएंगे तब एक बार पुनः वो सुदर्शन चक्र धरण करेंगे। 
दोस्तों प्राचीन ग्रंथों में वर्णित ब्रह्मास्त्र, आग्नेयास्त्र सुदर्शन चक्र जैसे अस्त्र अवश्य ही विभिन्न  शक्ति से सम्पन्न थे, किन्तु हम स्वयं ही अपने प्राचीन ग्रंथों में वर्णित विवरणों को मिथक मानते हैं और उनके आख्यान तथा उपाख्यानों को कपोल कल्पना, हमारा ऐसा मानना केवल हमें मिली दूषित शिक्षा का परिणाम है जो कि, अपने धर्मग्रंथों के प्रति आस्था रखने वाले पूर्वाग्रह से युक्त, पाश्चात्य विद्वानों की देन है, पता नहीं हम कभी इस दूषित शिक्षा से मुक्त होकर अपनी शिक्षानीति के अनुरूप शिक्षा प्राप्त कर भी पाएँगे या नहीं।
आज का श्लोका ज्ञान 
अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनद्वयम् |
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ||

अर्थात् : महर्षि वेदव्यास जी ने अठारह पुराणों में दो विशिष्ट बातें कही हैं | पहली –परोपकार करना पुण्य होता है और दूसरी — पाप का अर्थ होता है दूसरों को दुःख देना |

krishna, vishnu, lord vishnu, sudarshan, mahabharata, ramayana, mahabharat, what is sudarshan chakra, where is sudarshan chakra, hinduism, sudarshan chakra,  sudrashan chakr ka niraman, सुदर्शन चक्र,  sudarshan chakra story, भगवान विष्णु, vishnu sudarshan chakra, विष्णु भगवान, about sudarshan chakra, story of sudarshan chakra, sudarshan chakra ki kahani, sudarshan chakra hindi, sudarshan chakra in hindi, krishna, vishnu, sudarshan chakra astrology,  krishna story, shree krishna, mahabharat gita, ancient stories and myths

Sunday, 28 October 2018

क्या होता अगर वीर बर्बरीक और महाप्रतापी इंद्रजीत के बीच युद्ध होता || Ka...



        बरबरीक
और इंद्रजीत
जब जब पृथ्वी पर पाप का घड़ा भरने लगता है तब तब
ईश्वर धर्म की स्थापना के लिए जन्म लेते हैं और इसी से रचना होती है नए धार्मिक
ग्रंथ की जो युगो युगो तक मनुष्य को मार्गदर्शन देता है। महाभारत और रामायण भी ऐसे
ही ग्रंथ हैं जिसमे भारत के इतिहास के बारे मे विस्तार से लिखा गया है जो यह सिद्ध
करता है की भारत एक देश नहीं अपितु राष्ट्र है एक राष्ट्र जो जन्म नहीं लेता न
बनाया जाता है वो तो युगो युगो से यथावत है जिसमे संस्कृति बनती है धर्म बनाता है।
महाभारत और रामायण की कथाएँ हमे आज के जीवन मे कठिन से कठिन समस्याओं से बाहर
निकालने की प्रेरणा देती हैं। हम भली भाति जानते हैं की दोनों ही ग्रन्थों मे धर्म
युद्ध का वृतांत है और कुछ महान योद्धाओं का जिक्र आता है। दोस्तों हमने अपने
पिछले अध्यायों मे रामायण और महाभारत के कुछ महान पत्रों जैसे रावण और पितामह
भीष्म
, लक्ष्मण और अर्जुन, कुंभकर्ण और भीम जैसे पत्रों की
तुलना की है इसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए आज हम महाभारत और रामायण से दो और महारथियों
की तुलना करेंगे॥ पहला है महाबली भीम के पौत्र बरबारीक और दूसरा है रावण का
महाप्रतापी पुत्र मेघनाद इंद्रजीत। आज इस विडियो मे दोनों ही योद्धाओ की विषताओं
और कमियों पर बात करेंगे और ये समझने का प्रयास करेंगे की कोन किससे बेहतर योद्धा
है।
ये काल चक्र है...
यहाँ एक तरफ हैं महाबली भीम के पौत्र और अतिबलशाली
घटोत्कच का पुत्र बरबरीक जिसकी शक्ति से प्रभावित होकर स्वम भगवान कृष्ण को  उसके समक्ष आना पड़ा और महाभारत युद्ध न लड़ने
देने के लिए युद्ध से पहले ही उन्होने अपने सुदर्शन से उसका सर काटना पड़ा। शक्ति
और सामर्थ्य का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है की बरबारीक के कटे सिर ने पूरा
महाभारत युद्ध देखा क्यूँ की भगवान कृष्ण ने उसे ऐसा वरदान दिया था।
तो दूसरी तरफ हैं देवताओं तक को उनके राज्य से
बेदखल कर उनके राजा इंद्रा को बंदी बना लेने वाले मेगनाद इंद्रजीत। उनके ताकत का
अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है की राम रावण युद्ध मे अपनी माया से उन्होने
लक्ष्मण तक को मूर्छित कर दिया।
 आइए दोनों
हीं योद्धाओं की विशेषताओं पर नजर डालते हैं और ये समझने का प्रयास करते हैं की इन
दोनों मे कोण अधिक श्रेष्ठ था।
पहला सिक्षा— इंद्रजीत के गुरु थे गुरु शुक्राचार्य
और बरबारीक के गुरु उनकी माता अहिलावती थी जो एक नागकन्या थीं। नैतिक सिक्षा के
आधार पर यहाँ बरबारीक जायदा मजबूत हैं।
अब आते उनके अस्त्र सस्त्र पर— इंद्राजीत के पास उस
वक़्त के तीनो ही महान अस्त्र ब्रह्मास्त्र वैष्णवास्त्र और पसुप्तास्त थे. और उसका
रथ भी एक अस्त्र की भांति शक्तिशाली था. 
इन्द्रजीत के पास नागपास अस्त्र भी था जिससे उसने लक्ष्मण तक को मुर्चित कर
दिया था परन्तु बरबारीक के अस्त्रों की बराबरी फिर भी नही की जा सकती है उसके पास
ऐसे तीन बान थे जिनसे वो समस्त सतरु सेन का विनाश कर सकता था। उसके एक बान की
काबलियत को देख कर स्वम भगवान कृष्ण को बरबारीक को युद्ध से अलग रखने के लिए उसका
शीश काटना पड़ा। महाभारत के सभी महारथियों
aur समस्त सैनिकों
का एक पल मे विनाश करने वाले बनो की तुलना किसी से संभव नहीं है। उन बनो के समक्ष
इंद्रजीत जैसा योद्धा भी छोटा प्रतीत होता है।
अब बात करते हैं बहुबल कीइन्द्रजीत एक मायावी योधा था उसने अपने माया से इंद्रा तक को पराजित कर
दिया था और उसी के बाद उसका नाम इन्द्रजीत पड़ा लक्ष्मण जैसे योद्धा को मूर्छित
करने वाला इंद्रजीत ही था। परंतु बरबारीक को भी कम नहीं आँका जा सकता है महाभारत
मे ही एक प्रसंग ऐसा भी आता है जब भूल वश एक बार बरबारीक का सामना अपने ही दादा
भीम से हो गया था तब भी बरबारीक अपने दादा से पराजित नही हुआ था ।
दोस्तों वरदान के नजरिए से देखा जाए तो जब बरबारीक
ने भगवान कृष्ण को अपना शीश दान स्वरूप दिया तब भगवान कृष्ण ने उसे ये वरदान दे
दिया की इस बलिदान को हमेशा याद रखा जाएगा और तुम्हारी पुजा मेरे ही एक रूप मे
युगों युगों तक होगी क्युकी बर्बरीक का शीश खाटू नगर में दफनाया गया था इसलिए
उन्हें खाटूश्याम जी कहते है। इधर इंद्राजीत उसे युद्ध में कोई भी पराजित नहीं कर
सकता है. यहाँ भी बरबरीक का वरदान इंद्रजीत के वरदान से श्रेस्ठ दिखता है।
दोस्तों वीर बरबारीक और महाप्रतापी इंद्रजीत के बीच
अगर युद्ध होता तो उसमे कौन वजई होता इसपर आप अपने विचार हमे कोमेंट बॉक्स मे
लिखकर बता सकते हैं विडियो पसंद आई है तो विडियो को लाइक जरुर करे और ऐसी ही
धार्मिक विदेओस देखने के लिए हमारे इस चैनल को सुब्स्कृबे जरूर करे । धन्यवाद।    

     

Thursday, 4 October 2018

सिर्फ एक ही युद्ध हारे थे हनुमान जी, जानिए कौन था वह योद्धा || Kaal Chakra



जिंदगी में एक ही युद्ध हारे थे हनुमान, जानिए कौन था वह
योद्धा !!
हनुमान सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ हैं। हनुमान के बगैर न तो
राम हैं और न रामायण। राम-रावण युद्ध में हनुमानजी ही एकमात्र अजेय योद्धा थे
जिन्हें कोई भी किसी भी प्रकार से क्षति नहीं पहुंचा पाया था। यूं तो हनुमानजी के
पराक्रम
, सेवा, दया और दूसरों का
दंभ तोड़ने की हजारों गाथाएं हैं लेकिन
आज हम पुरानो के माध्यम से ऐसे घटना को लेकर आए हैं जब
हनुमान जी को किसी भी युद्ध मे पहली बार हार का सामना करना पड़ा इतना ही नहीं इस
युद्ध में हनुमान जी को हराने वाला कोई और नहीं एक राम भक्त ही था... तो कौन था वह
योद्धा जिसने हनुमान जी को हरा दिया और उस युद्ध का इस पृथ्वी पर क्या प्रभाव
पड़ा...
?
ये काल चक्र है॥
दोस्तों किसी समय मे मच्छिंद्रनाथ
नाम के एक बहुत बड़े तपस्वी हुआ करते थें
, एक बार जब वो रामेश्वरम में आए तो भगवान राम द्वारा निर्मित
सेतु देख कर वे भावविभोर हो गए और प्रभु राम की भक्ति में लीन होकर वे समुद्र में
स्नान करने लगे। तभी वहां वानर वेश में उपस्थित हनुमान जी की नज़र उन पर पड़ी वो
जानते थे की मचींद्रनाथ जी कितने बड़े तपस्वी हैं फिर भी उन्होंने मच्छिंद्रनाथ जी
के शक्ति की परीक्षा लेनी चाही। इसलिए हनुमान जी ने अपनी लीला आरंभ की
, जिससे वहां जोरों की बारिश होने लगी, ऐसे में बानर रूपी हनुमान जी उस बारिश से बचने के लिए एक
पहाड़ पर वार कर गुफा बनाने की कोशिश का स्वांग करने लगे। दरअसल उनका उद्देश्य था
कि मच्छिंद्रनाथ का ध्यान टूटे और उन पर नज़र पड़े और वहीं हुआ मच्छिंद्रनाथ ने
तुरंत सामने पत्थर को तोड़ने की चेष्टा करते हुए उस वानर से कहा
, ‘हे वानर तुम क्यों ऐसी मूर्खता कर रहे हो, जब प्यास लगती है तब कुआं नहीं खोदा जाता, इससे पहले ही तुम्हें अपने घर का प्रबंध कर लेना चाहिए था।
 ये सुनते ही वानर रूपी हनुमान जी ने
मच्छिंद्रनाथ से पूछा
, आप कौन हैं?
जिस पर मच्छिंद्रनाथ ने स्वयं
का परिचय दिया
मैं एक सिद्ध योगी हूं
और मुझे मंत्र शक्ति प्राप्त है।
जिस पर हनुमान जी ने
मच्छिंद्रनाथ की शक्ति की परीक्षा लेने के उद्देश्य से कहा
, वैसे तो प्रभु श्रीराम और महाबली हनुमान से श्रेष्ठ योद्धा
इस संसार में कोई नहीं है
, पर कुछ समय
उनकी सेवा करने के कारण
, उन्होंने
प्रसन्न होकर अपनी शक्ति का कुछ प्रतिशत हिस्सा मुझे भी दिया है
, ऐसे में अगर आप में इतनी शक्ति है और आप पहुंचे हुए सिद्ध
योगी है तो मुझे युद्ध में हरा कर दिखाएं
, तभी मैं आपके तपोबल को सार्थक मानूंगा, अन्यथा स्वयं को सिद्ध योगी न कहें।
यह सब सुनकर मच्छिंद्रनाथ जी ने
उस वानर की चुनौती स्वीकार कर ली और युद्ध की शुरुआत हो गई। जिसमें वानर रुपी
हनुमान जी ने मच्छिंद्रनाथ पर एक-एक करके कई बड़े पर्वत फेंके
, पर इन पर्वतों को अपनी तरफ आते देख मच्छिंद्रनाथ ने अपनी
मंत्र शक्ति का प्रयोग किया और उन सभी 
पर्वतों को हवा में स्थिर कर उन्हें उनके मूल स्थान पर वापस भेज दिया। इतना
देखते ही महाबली को क्रोध आया उन्होनें मच्छिंद्रनाथ पर फेंकने के लिए वहां
उपस्थित सबसे बड़ा पर्वत अपने हाथ में उठा लिया। जिसे देखकर मच्छिंद्रनाथ ने
समुंद्र के पानी की कुछ बूंदों को अपने हाथ में लेकर उसे वाताकर्षण मंत्र से सिद्ध
कर उन पानी की बूंदों को हनुमान जी के ऊपर फेंक दिया।
इन पानी की बूंदों का स्पर्श
होते ही हनुमान के शरीर मे अजीब सी हलचल हुई  और एकदम से स्थिर हो गया
, साथ ही उस मंत्र की शक्ति से कुछ क्षणों के लिए हनुमान जी
की शक्ति छिन्न गई और ऐसे में वे उस पर्वत का भार न उठा पाने के कारण तड़पने लगे।
तभी हनुमान जी का कष्ट देख उनके पिता वायुदेव वहां प्रगट हुए और मच्छिंद्रनाथ से
हनुमान जी को क्षमा करने की प्रार्थना की। वायुदेव की प्रार्थना सुन मच्छिंद्रनाथ
ने हनुमान जी को मुक्त कर दिया और हनुमान जी अपने वास्तविक रुप में आ गए। इसके बाद
उन्होंने मच्छिंद्रनाथ से कहा
हे
मच्छिंद्रनाथ
, मैं आपको भलीभांति जानता
था
,
फिर भी मैं आपकी शक्ति की परीक्षा लेने की प्रयास कर बैठा, इसलिए आप मेरी इस भूल को माफ करें। ये सुनकर और स्थिति को
समझते हुए मच्छिंद्रनाथ जी ने हनुमान जी को माफ़ कर दिया।
hanuman battle against ravana,
hanuman and machindranath,
hanuman and machindranath fight,
hanuman and parshuram fight
hanuman yudh,
hanuman parshuram yudh,
hanuman fight,
hanuman balram yudh,
hanuman war,
hanuman and bhairav,
hanuman ji ka yudh,
hanuman ji defeated,

कलयुग में नारायणी सेना की वापसी संभव है ? The Untold Story of Krishna’s ...

क्या महाभारत युद्ध में नारायणी सेना का अंत हो गया ... ? या फिर आज भी वो कहीं अस्तित्व में है ... ? नारायणी सेना — वो ...