Tuesday, 30 January 2018

वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास कृत रामचरितमानस में क्या मुख्य अंतर हैं? || ...

वाल्मीकि रामायण और तुलसीदास कृत रामचरितमानस में क्या मुख्य अंतर हैं?



वैदिक काल से लेकर आधुनिक काल तक लेखकों और कवियों ने न
केवल भारत भूमि बल्कि विदेशों में भी राम कथा का अपनी भाषा और अपने अंदाज़ में
वर्णन किया है. एक अनुमान के अनुसार दुनिया भर में
300 से ज्यादा रामायण
लिखी और पढ़ी गईं हैं जो हमें राम कथा के कई अनछुए पहलुओं की जानकारी देती हैं.
लेकिन वास्तविकता में श्री राम के चरित्र और गुणों का वर्णन जिन दो मुख्य ग्रन्थों
में किया गया है वो हैं-वाल्मीकि रचित
रामायणऔर तुलसीदास की रामचरितमानस”. यद्यपि रामायण और रामचरितमानस दोनों में ही राम के चरित्र
का वर्णन है परंतु दोनों ही महाकाव्यों के रचने वाले कवियों की वर्णन शैली में
उल्लेखनीय अन्तर है।
कई लोग तुलसीदास
की रामचरित मानस को ही मूल रामायण मानते हैं। आज हम इस विडियो के माध्यम से आपको
ये बताएँगे की दोनों ग्रंथों में मूल रूप से क्या अंतर है
?
ये काल चक्र है....
वाल्मीकि रामायण
हृदय परिवर्तन के बाद दस्यु से ऋषि बन जाने वाले वाल्मीकि ऋषि
ने संस्कृत भाषा में एक महाकाव्य की रचना की. इस ग्रंथ में 24,000 श्लोकों को 500
सर्ग और 7 कांड में लिखा गया है. एक अनुमान के अनुसार 600 ईसा पूर्व रचे गए इस
महाकाव्य में अयोध्या के राजा राम के चरित्र को आधार बनाकर विभिन्न भावनाओं और
शिक्षाओं को बहुत सरल तरीके से समझाया गया है.
राजा राम का चरित्र बाल्मीकी ने एक साधारण मानव के रूप में
चित्रित किया है जो बाल रूप से लेकर राजा बनकर न्यायप्रिय तरीके से राज करके अपनी
प्रजा के हित के लिए किसी भी निर्णय को लेने में हिचकते नहीं हैं. उनके द्वारा
किये गए कामों में कहीं भी किसी दैवीय शक्ति का प्रयोग दिखाई नहीं देता है.
वाल्मीकि ने सम्पूर्ण महाकाव्य में राम को एक साधारण पुत्र, भाई और पति के
रूप में ही चित्रित किया है. एक साधारण मानव जिसे अपने हर काम के लिए अपने मित्रों
और सहयोगियों की आवश्यकता होती है. न केवल राम
, बल्कि इस
महाकाव्य का हरेक पात्र
, चाहे वो भरत, शत्रुघ्न, लक्ष्मण या
विभीषण जैसा भाई हो
, उर्मिला, सीता , कैकई और मंदोदरी
जैसी पत्नी हो
, हनुमान जैसा मित्र हो या फिर दशरथ जैसा पिता हो, हर चरित्र को
सशक्त और प्रेरक रूप में प्रस्तुत किया है.
तुलसी की रामचरितमानस
अवधि भाषा में रची गयी रामचरितमानस सोलहवीं शताब्दी में
तुलसीदास द्वारा रची गयी रचना है. बाल्मीकी रामायण को आधार मान कर रची गयी यह रचना
एक भक्त का अपने आराध्य के प्रति प्रेम और समर्पण का प्रतीक है. तुलसीदास जी ने इस
ग्रंथ में राम के चरित्र का निर्मल और विशद चित्रण किया है.
विष्णु के अवतार श्री राम के जीवन चरित्र को सात कांडों के
रूप में दर्शाया गया है इस चरित्र वर्णन में तुलसीदास जी ने हिन्दी भाषा के
अनुप्रास अलंकार का खुलकर उपयोग किया है और इसके अतिरिक्त पूरी कथा में यथानुसार
श्रृंगार
, शांत और वीर रस का भी प्रयोग किया है. इस रचना में राम के
चरित्र को एक महानायक और महाशक्ति के रूप में दर्शाया गया है.
रामायण और रामचरितमानस में क्या अंतर है?
दोनों ग्रन्थों में अंतर मुख्य पात्र के चरित्र चित्रण का
है. रामायण के राम एक सरल साधारण मानव हैं जो हर मानवीय भावना से प्रेरित हैं
, जबकि तुलसी के
राम एक दैवीय शक्ति से युक्त अतिमानव हैं जो स्वयं एक महाशक्ति का रूप हैं. तुलसी
के राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं और बाल्मीकी के राम मानवीय भावनाओं के संतुलित रूप
हैं. सबसे बड़ा अंतर है दोनों ग्रंथो के रचना आधार का
 है. बाल्मीकी ने
रामायण की रचना ऐतिहासिक घटना पर आधारित ग्रंथ है और तुलसीदास ने वाल्मीकि रामायण
को ही आधार मानकर अपने आदर्श चरित्र
रामको गढ़ा है.
दोस्तों -- अंतर चाहे जो भी हो, राम वाल्मीकि के
साधारण मानव और तुलसी के दैवीय शक्तियों से युक्त मानव
, दोनों ही रूपों
में लोकप्रिय और वंदनीय हैं.


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Tuesday, 16 January 2018

Kaal Chakra || ऋषि दुर्वासा के पीछे क्यों पड़ गया था सुदर्शन चक्र? ||

ऋषि दुर्वासा के पीछे क्यों पड़ गया था सुदर्शन चक्र?



भारत के पौराणिक इतिहास में अनेक ऐसे ऋषियों, मुनियों का जिक्र
है
, जिनके पास अलौकिक
शक्तियां थीं। वह अपनी इसी शक्ति के कारण चाहे तो श्राप देकर सामने वाले को भस्म
कर सकते थे या फिर वरदान के द्वारा किसी का जीवन खुशियों से भर देते थे। यह सब
उन्हें क्रोधित करने व प्रसन्न करने से जुड़ा था।ऐसे ही एक महर्षि थे दुर्वासा ऋषि
, जो अपने क्रोध के
लिए जाने जाते थे। ऋषि दुर्वासा को शिव का अवतार कहा जाता था लेकिन जहां भोले शंकर
को प्रसन्न करना बेहद आसान माना जाता है वहीं ऋषि दुर्वासा को प्रसन्न करना शायद
सबसे मुश्किल काम था
. ऋषि दुर्वासा के क्रोध से जुड़ी अनेक कहानियां हमारे पौराणिक इतिहास में मौजूद
हैं
, जब किसी के कृत्य या दुस्साहस ने उन्हें इस कदर क्रोधित कर
दिया कि उन्हें अपना आपा खोना पड़ा।लेकिन हर बार नुकसान सामने वाले व्यक्ति को ही
उठाना पड़े ऐसा जरूरी नहीं है
, कभी-कभार आपका क्रोध और अहंकार स्वयं आपके लिए
भी घातक साबित हो जाता है। दुर्वासा ऋषि के साथ भी ऐसा ही हुआ जब उनका क्रोध उनकी
जान के पीछे पड़ गया
.
ये काल चक्र है इस काल चक्र में मैं आप सब का अभिनन्दन करता
हूँ youtube के बेल आइकॉन को बजाना न भूलें हमारे लेटेस्ट अपडेट के लिए
 इक्ष्वांकु वंश के
राजा अंबरीश विष्णु के परम भक्त होने के साथ-साथ बेहद न्यायप्रिय शासक थे। उनके
शासनकाल में प्रजा खुशहाल और संपन्न जीवन व्यतीत कर रही थी। उनके तप से विष्णु इस
कदर प्रसन्न थे कि अपने सुदर्शन चक्र का नियंत्रण अंबरीश के हाथ में सौंप रखा
था।एक बार राजा अंबरीश ने एकादशी का व्रत रखने का निर्णय लिया। यह व्रत इतना
ताकतवर होता है कि देवेंद्र तक इसकी शक्ति से हिल गए। अंबरीश अपना व्रत संपन्न ना
कर पाएं इसके लिए इन्द्र देव ने दुर्वासा ऋषि को उनके पास जाने को कहाव्रत खोलने
का समय जैसे ही नजदीक आया
, दुर्वासा ऋषि भी अंबरीश के महल पहुंच गए।
उन्होंने अंबरीश से कहा कि वे स्नान कर जल्दी ही लौटते हैं
अंबरीश ने सम्मानपूर्वक ऋषि दुर्वासा का बहुत देर इंतजार
किया
, लेकिन लंबी अवधि बीत जाने के बाद भी जब दुर्वासा ऋषि स्नान
से वापस नहीं आए तब अंबरीश ने देवताओं का ध्यान कर उन्हें आहुति दी और कुछ भाग
दुर्वासा के लिए निकाल लिया।व्रत खोलने का समय बीत जाने के बाद दुर्वासा वापस आए।
वह ये देखकर अत्याधिक क्रोध हो उठे कि उनकी अनुपस्थिति में राजा ने अपना व्रत खोल
लिया। क्रोध के आवेश में आकर उन्होंने कृत्या राक्षसी की रचना की और उसे अंबरीश पर
आक्रमण करने का निर्देश दिया।
अपनी जान बचाने के लिए अंबरीश ने सुदर्शन चक्र को प्रहार
करने का आदेश दिया। सुदर्शन चक्र के प्रहार से कृत्या राक्षसी उसी समय मारी गयी। कृत्या
का वध करने के बाद सुदर्शन चक्र ऋषि दुर्वासा का पीछा करने लगा। अपनी जान बचाने के
लिए ऋषि दुर्वासा इधर-उधर भागने लगे लेकिन वह जहां भी जाते सुदर्शन चक्र उनके पीछे
आ जाता था।वह अपनी जान बचाने के लिए इन्द्र के पास पहुंचे। इन्द्र ने अपनी अक्षमता
दर्शाते हुए उन्हें ब्रह्मा के पास भेज दिया। ब्रह्मा ने उन्हें शिव और शिव ने
उन्हें विष्णु के पास जाने को कहा।आखिरकार वे विष्णु के पास पहुंचे। विष्णु ने
उन्हें कहा कि सुदर्शन चक्र का नियंत्रण अंबरीश के पास है इसलिए उन्हें अंबरीश के
पास ही जाना होगा। हार कर दुर्वासा अंबरीश के पास पहुंचे और सुदर्शन चक्र को रोकने
को कहा।राजा ने ऋषि की प्रार्थना मान ली और आखिरकार सुदर्शन चक्र को रोककर
दुर्वासा ऋषि की जान बचाई।
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Tuesday, 12 December 2017

एक श्राप के कारण हुआ असुर सम्राट रावण का जन्म || The story of Ravan's bi...

              जय और विजय को शाप



असुर
सम्राट रावण के पिता एक ऋषि थे और उसकी माता एक असुर कन्या। उसे एक महापंडित
, महाज्ञानी, महान ज्योतिषशात्री और महान शिव भक्त
के तौर पर भी जाना जाता है। रावण के पास शास्त्र
, तंत्र-मंत्र, संगीत, ज्योतिष और खगोलविद्या का भी ज्ञान था। पौराणिक कथा के अनुसार रावण अपने
पूर्वजन्म में स्वर्गलोक से संबंध रखता है। लेकिन ऐसा क्या हुआ जो उसे ना सिर्फ
आगामी जन्म में बल्कि आने वाले तीन जन्मों तक असुर के रूप में ही जन्म लेना पड़ा?
ये
काल चक्र है इस काल चक्र में मैं आप सब का अभिनन्दन करता हूँ. मै आशा करता हूँ की
आप हमारे इस विडियो को पूरा देखेने के बाद हमारे इस चैनल को सब्सक्राइब जरुर
करेंगे और yutube के bell icon को बजाना न भूलें हमारे latest update के लिए. आईये
जानते हैं रावण के स्वर्ग लोक से पृथ्वी लोक पर आने की कहानी.  
एक
बार ब्रह्मा जी के मानसपुत्र सनक
, सनन्दन, सनातन एवं सनतकुमार भगवान विष्णु के
दर्शन हेतु बैकुण्ठधाम पहुँचे।
जब वे भगवान विष्णु के द्वार पर पहुँचे
तो जय और विजय नामक दो द्वारपालों ने उन्हें रोककर कहा कि इस समय भगवान विष्णु
विश्राम कर रहे हैं
, अतः आप लोग भीतर नहीं जा सकते।
जय
और विजय के द्वारा इस प्रकार से रोके जाने पर ऋषिगणों ने क्रोधित होकर कहा
, "अरे मूर्खों! हम भगवान विष्णु के भक्त
हैं और भगवान विष्णु तो अपने भक्तों के लिए सदैव उपलब्ध रहते हैं। तुम दोनों अपनी
कुबुद्धि के कारण हम लोगो को भगवान विष्णु के दर्शन से विमुख रखना चाहते हो। ऐसे
कुबुद्धि वाले विष्णुलोक में रहने के योग्य नहीं है। अतः हम तुम्हें शाप देते हैं
कि तुम दोनों का देवत्व समाप्त हो जाये और तुम दोनों भूलोक में जाकर पापमय योनियों
में जन्म लेकर अपने पाप का फल भोगो।"सनकादिक ऋषियों के इस घोर शाप को सुनकर जय
और विजय भयभीत होकर उनसे क्षमा याचना करने लगे। इसी समय भगवान विष्णु भी वहाँ पर आ
गये। जय और विजय भगवान विष्णु से प्रार्थना करने लगे कि वे ऋषियों से अपना शाप
वापस ले लेने का अनुरोध करें।

भगवान
विष्णु ने उन दोनों से कहा
,
"
ऋषियों का शाप
कदापि व्यर्थ नहीं जा सकता। तुम दोनों को भूलोक में जाकर जन्म लेना ही पड़ेगा। अपने
अहंकार का फल भोग लेने के बाद तुम दोनों पुनः मेरे पास वापस आवोगे। तुम दोनों के
पास यहाँ वापस आने के लिए दो विकल्प है
, पहला
यह कि यदि तुम दोनों भूलोक में मेरे भक्त बन कर रहोगे तो सात जन्मों के बाद यहाँ
वापस आवोगे और दूसरा यह कि यदि भूलोक में जाकर मुझसे शत्रुता रखोगे तो तीन जन्मों
के बाद तुम दोनों यहाँ वापस आवोगे क्योंकि उन तीनों जन्मों में मैं ही तुम्हारा
संहार करूँगा।"
जय
और विजय सात जन्मों तक पृथ्वीलोक में नहीं रहना चाहते थे इसलिए उन्होंने दूसरे
विकल्प को मान लिया।
उन्हीं जय और विजय भूलोक में सत् युग
में अपने पहले जन्म में हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यपु
, त्रेता युग में अपने दूसरे जन्म में रावण और कुम्भकर्ण तथा द्वापर
में अपने तीसरे जन्म में शिशुपाल और दन्तवक्र बने।
यस्य
कृत्यं न जानन्ति मन्त्रं वा मन्त्रितं परे।
कृतमेवास्य
जानन्ति स वै पण्डित उच्यते ॥
भावार्थ
:
दूसरे
लोग जिसके कार्य
, व्यवहार, गोपनीयता, सलाह और विचार को कार्य पूरा हो जाने
के बाद ही जान पाते हैं
, वही व्यक्ति ज्ञानी कहलाता है ।

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Wednesday, 15 November 2017

कलयुग का आगमन ... || Kaal Chakra

        कलयुग
का आगमन




पुराणों
में चार युगों के विषय में बताया गया है
, सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग और कलियुग। कलियुग को छोड़
दिया जाए तो तीनों ही युगों की अपनी-अपनी
कुछ न कुछ विशेषता रही है। परंतु कलियुग में विशेषता
जैसा तो कुछ भी नहीं दिखता, चारो ओर अहंकार, प्रतिशोध, लालच और आतंक ही दिखाई देता है। कलियुग
को एक श्राप कहा जाता है
,
जिसे हर मौजूदा इंसान भुगत रहा है। हां, तकनीक का अत्याधिक विकास भी इसी युग
में हुआ परंतु क्या केवल एक इसी बात के लिए हम हजारों नकारात्मक
शक्तियों
को नजरअंदाज कर सकते हैं?  शायद ही कोई व्यक्ति इस सवाल का जवाब हांमें देगा। महान गणितज्ञ आर्यभट्ट ने
अपनी पुस्तक
आर्यभट्टियममें इस बात का उल्लेख किया है कि जब वह
23 वर्ष के थे तब कलियुग का 3600वां वर्ष चल रहा था। आंकड़ों के अनुसार आर्यभट्ट का
जन्म 476 ईसवीं में हुआ था। गणना की जाए तो कलियुग का आरंभ 3102 ईसापूर्व हो चुका
था। क्या
आपने कभी इस बात की ओर ध्यान दिया है कि ऐसा क्या कारण रहा होगा जिसके
चलते कलियुग को धरती पर आना पड़ा
? वह ना सिर्फ आया बल्कि यहां आकर यहीं का हो गया,  आज हम इस विडियो मे कलयुग के
धरती पर आगमन की कहानी बताएँगे।
ये काल चक्र है इस काल चक्र मे मैं आप सब का
अभिनंदन करता हूँ। मै आशा करता हूँ की आप हमारे विडियो को पूरा देखेने के बाद
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के bell icon को बजाना न भूलें हमारे लेटेस्ट update
के लिए।
बात उस समय की है जब धर्मराज युधिष्ठिर अपना पूरा
राजपाट परीक्षित को सौंपकर अन्य पांडवों और द्रौपदी समेत महाप्रयाण हेतु हिमालय की
ओर निकल गए थे। उन दिनों स्वयं धर्म
, बैल का रूप लेकर
गाय के रूप में बैठी पृथ्वी देवी से सरस्वती नदी के किनारे मिले। गाय रूपी पृथ्वी
के नयन आंसुओं से भरे हुए थे
, उनकी आंखों से आंसू बह रहे थे।
पृथ्वी को दुखी देख धर्म ने उनसे उनकी परेशानी का कारण पूछा। धर्म ने कहा
देवी! क्या तुम इस बात से दुखी हो कि अब तुम्हारे ऊपर बुरी ताकतों का शासन
होगा
?
पृथ्वी बोली - "हे धर्म! तुम सर्वज्ञ होकर भी
मुझ से मेरे दुःख का कारण पूछते हो-- भगवान श्रीकृष्ण के जिन चरणों की सेवा
लक्ष्मी जी करती हैं उनमें कमल
, वज्र, अंकुश,
ध्वजा आदि के चिह्न विराजमान हैं और वे ही चरण मुझ पर पड़ते थे
जिससे मैं सौभाग्यवती थी। अब मेरा सौभाग्य समाप्त हो गया है यही मेरे दुख का कारण
है। धर्म और पृथ्वी आपस में बात कर ही रहे थे कि इतने में असुर रूपी कलियुग वहां आ
पहुंचा और बैल और गाय रूपी धर्म और पृथ्वी को मारने लगा। राजा परीक्षित वहां से
गुजर रहे थे
, जब उन्होंने यह दृश्य अपनी आंखों से देखा तो
कलियुग पर बहुत क्रोधित हुए। अपने धनुष पर बाण रखते हुए राजा परीक्षित ने कलियुग
से कहा
दुष्ट, पापी! तू कौन है?
इन निरीह गाय तथा बैल को क्यों सता रहा है? तू
महान अपराधी है। तेरा अपराध क्षमा योग्य नहीं है
, तेरा वध
निश्चित है।
राजा
परीक्षित का क्रोध देखकर कलियुग कांपने लगा। कलियुग भयभीत होकर अपने राजसी वेष को
उतार कर राजा परीक्षित के चरणों में गिर गया और क्षमा याचना करने लगा। राजा
परीक्षित ने शरण में आए हुए कलियुग को मारना उचित न समझा और उससे कहा
हे कलियुग! तू मेरे शरण में आ गया है
इसलिए मैं तुझे जीवनदान दे रहा हूं। किन्तु अधर्म
, पाप, झूठ, चोरी, कपट, दरिद्रता आदि अनेक उपद्रवों का मूल कारण केवल तू ही है। तू मेरे
राज्य से अभी निकल जा और फिर कभी लौटकर मत आना
परीक्षित
की बात को सुनकर कलियुग ने कहा कि पूरी पृथ्वी पर आपका निवास है
, पृथ्वी पर ऐसा कोई भी स्थान नहीं है
जहां आपका राज्य ना हो
, ऐसे में मुझे रहने के लिए स्थान प्रदान
करें
कलियुग
के ये कहने पर राजा परीक्षित
ने सोच विचार कर कहा झूठ, द्यूत, परस्त्रीगमन और हिंसा,  इन चार स्थानों में असत्य, मद, काम और क्रोध का निवास होता है। तू इन
चार स्थानों पर रह सकता है। परंतु इस पर कलियुग बोला - "हे राजन
, ये चार स्थान मेरे रहने के लिए प्रयाप्त
नहीं
है, मुझे अन्य जगह भी प्रदान कीजिए।  इस मांग पर राजा परीक्षित ने उसे स्वर्ण के रूप
में पांचवां स्थान प्रदान किया। कलियुग इन स्थानों के मिल जाने से प्रत्यक्षतः तो
वहाँ से चला गया किन्तु कुछ दूर जाने के बाद अदृश्य रूप में वापस आकर राजा
परीक्षित के स्वर्ण मुकुट में निवास करने लगा।
इस
प्रकार कलयुग का आगमन हुआ।
वृथा वृष्टिः समुद्रेषु, वृथा तृप्तेषु भोजनम् ।
वृथा दानं धनाढ्येषु वृथा दीपो दिवापि च ॥
समुद्र
के लिए वर्षा होना व्यर्थ है। तृप्त व्यक्ति के लिए भोजन व्यर्थ है। धनी व्यक्ति
को दान देना व्यर्थ है। दिन के समय दीपक जलाना व्यर्थ है।

How many years of kalyug
has passed,
When Kaliyuga is going
to end,
Where Kalki will born,
What are the four
Yugas,
When Kalki Avatar will
happen,
Which Yuga was Krishna
born in,

Wednesday, 1 November 2017

वैज्ञानिक भी हैं हैरान इन मन्दिरों को देख ... || Kaal Chakra

वैज्ञानिक भी हैं हैरान इन मन्दिरों को देख



मन्दिरों का अस्तित्व और उनकी भव्यता गुप्त राजवंश
यानि चौथी से छठी शताब्दी के समय से देखने को मिलती है। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं
होगा कि गुप्त काल से हिन्दू मंदिरों का महत्त्व और उनके आकार में उल्लेखनीय
विस्तार हुआ और उनकी बनावट पर स्थानीय वास्तुकला का विशेष प्रभाव पड़ा। उत्तरी
भारत में हिन्दू मंदिरों की उत्कृष्टता उड़ीसा तथा उत्तरी मध्यप्रदेश के खजुराहो
में देखने को मिलती है। उड़ीसा के भुवनेश्वर में स्थित लगभग 1000 वर्ष पुराना
लिंगराजा का मन्दिर वास्तुकला का सर्वोतम उदाहरण है। धर्म
, भक्ति, अध्यात्म और साधना का देश भारत, जहां प्राचीन काल से पूजा-स्थल के रूप में मंदिर विशेष महत्व रखते रहे
हैं। यहां कई मंदिर ऐसे हैं
, जहां अविश्वशनिए  चमत्कार भी होते बताए जाते हैं। जहां आस्थावानों
के लिए वे चमत्कार दैवी कृपा हैं
, तो अन्य के लिए आश्चर्य का
विषय। आइए जानते हैं
, भारत के कुछ विशिष्ट मंदिरों के बारे
में
, जिनके रहस्यों को असीम वैज्ञानिक प्रगति के बाद कोई
नहीं जान पाया है।
ये काल चक्र है इस काल चक्र मे मै आप सब का अभिनंदन
करता हूँ। मै आशा करता हूँ की आप इस विडियो को पूरा देखने के बाद हमारे इस चैनल को
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 बृहदेश्वर
मन्दिर
बृहदेश्वर मन्दिर तमिलनाडु के तंजौर में स्थित एक विशाल
हिंदू मंदिर है जो 11वीं सदी के आरम्भ मे चोल शासक प्रथम राजराज चोल ने बनवाया था।
इसे तमिल भाषा में बृहदीश्वर के नाम से जाना जाता है। बृहदेश्वर मंदिर पूरी तरह से
ग्रेनाइट से नि‍र्मि‍त है। विश्व में यह अपनी तरह का पहला और एकमात्र मंदिर है जो
कि ग्रेनाइट का बना हुआ है। यह अपनी भव्यता
, वास्‍तुशिल्‍प और
केन्द्रीय गुम्बद से लोगों को आकर्षित करता है। इस मंदिर को यूनेस्को ने विश्व
धरोहर घोषित किया है। ग्रेनाइट इस इलाके के आसपास नहीं पाया जाता और यह रहस्य अब
तक रहस्य ही है कि इतनी भारी मात्रा में ग्रेनाइट कहां से लाया गया।
करणी माता मंदिर
इस मंदिर को चूहों वाली माता का मंदिर भी कहा जाता
है
,
यह मंदिर  राजस्थान के
बीकानेर से 30 किलोमीटर दूर देशनोक शहर में स्थित है। करनी माता इस मंदिर की
अधिष्ठात्री देवी हैं
, जिनकी छत्रछाया में चूहों का
साम्राज्य स्थापित है। इन चूहों में अधिकांश काले है
, लेकिन
कुछ सफेद भी है
, जो काफी दुर्लभ हैं। मान्यता है कि जिसे
सफेद चूहा दिख जाता है
, उसकी मनोकामना अवश्य पूरी होती है। आश्चर्यजनक
यह है कि ये चूहे बिना किसी को नुकसान पहुंचाए मंदिर परिसर में दौड़ते-भागते और
खेलते रहते हैं। वे लोगों के शरीर पर कूदफांद करते हैं
, लेकिन
किसी को कोई नुकसान नहीं पहुंचाते। यहां ये इतनी संख्या में हैं कि लोग पांव उठाकर
नहीं चल सकते
, उन्हें पांव घिसट-घिसटकर चलना पड़ता है,
लेकिन मंदिर के बाहर ये कभी नजर ही नहीं आते।
ज्वालामुखी मंदिर
ज्वाला देवी का प्रसिद्ध ज्वालामुखी मंदिर हिमाचल
प्रदेश के कालीधार पहाड़ी के मध्य स्थित है। यह भी भारत का एक प्रसिद्ध शक्तिपीठ
है
,
जिसके बारे में मान्यता है कि इस स्थान पर माता सती की जीभ गिरी थी।
माता सती की जीभ के प्रतीक के रुप में यहां धरती के गर्भ से लपलपाती ज्वालाएं
निकलती हैं
, जो नौ रंग की होती हैं। इन नौ रंगों की ज्वालाओं
को देवी शक्ति का नौ रुप माना जाता है। किसी को यह ज्ञात नहीं है कि ये ज्वालाएं
कहां से प्रकट हो रही हैं
? ये रंग परिवर्तन कैसे हो रहा है?
आज भी लोगों को यह पता नहीं चल पाया है यह प्रज्वलित कैसे होती है
और यह कब तक जलती रहेगी
? कहते हैं, कुछ
मुस्लिम शासकों ने ज्वाला को बुझाने के प्रयास किए थे
, लेकिन
वे विफल रहे।
मेहंदीपुर बालाजी मंदिर
राजस्थान के दौसा जिले में स्थित है मेहंदीपुर का
बालाजी धाम। यह मंदिर भगवान हनुमान के 10 प्रमुख सिद्धपीठों में गिना जाता है।
मान्यता है कि इस स्थान पर हनुमानजी जागृत अवस्था में विराजते हैं। यहां देखा गया
है कि जिन व्यक्तियों के ऊपर भूत-प्रेत और बुरी आत्माओं का वास होता है
, वे यहां की प्रेतराज सरकार और कोतवाल कप्तान के मंदिर की जद में आते ही
चीखने-चिल्लाने लगते हैं और फिर वे बुरी आत्माएं
, भूत-पिशाच
आदि पल भर मे ही पीड़ितों के शरीर से बाहर निकल जाती हैं।
ऐसा कैसे और क्यूँ होता है, यह कोई नहीं जानता है? लेकिन लोग सदियों से
भूत-प्रेत और बुरी आत्माओं से मुक्ति के लिए दूर-दूर से यहां आते हैं। इस मंदिर
में रात में रुकना मना है।
आज का श्लोका ज्ञान:
नास्ति विद्यासमो बन्धुर्नास्ति विद्यासमः सुहृत् ।
नास्ति विद्यासमं वित्तं नास्ति विद्यासमं सुखम् ।।
विद्या जैसा बंधु नहीं, विद्या जैसा मित्र नहीं, (और) विद्या जैसा अन्य कोई
धन या सुख नहीं ।
दोस्तों हिन्दू मंदिरों के विषय मे हमारे द्वारा दी
गई जानकारी अगर आपको पसंद आई है तो हमारे इस विडियो को लाइक करें। अगर आपके मन मे
किसी भी हिन्दू मंदिर से जुड़ा कोई भी प्रश्न है तो आप हमे कमेंट बॉक्स मे बता सकते
हैं हम उस प्रश्न का उत्तर अवश्य देंगे। ऐसी हि नई नई जंकारियों के लिए हमारे इस
चैनल को सुब्स्कृबे जरूर करें। धन्यवाद।   
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Saturday, 14 October 2017

रानी पद्मिनी / पद्मावती का इतिहास Real Story Of Rani Padmini (Padmavati...

           
रानी पद्मावती का इतिहास




यदि
किसी
देश को
सदैव पराधीन बनाये रखना हो
, तो सबसे अच्छा उपाय यह है कि उस देश का इतिहास ही नष्ट कर दिया जाय और
अगर
कोई अवनत
राष्ट्र अपनी उन्नति करना
चाहता है, तो
उसे सबसे पहले अपने इतिहास
के निर्माण की आवश्यकता है। प्राचीन भारत
की सभ्यता
, संस्कृति तथा शासन कला का अध्ययन करने
के पूर्व इतिहास की उन सामग्रियों का अध्ययन करना अत्यावश्यक है जिनके द्वारा हमें
प्राचीन भारत के इतिहास का ज्ञान होता है। भारत के प्राचीन साहित्य तथा दर्शन के
संबंध में जानकारी के अनेक साधन उपलब्ध
तो हैं, परन्तु भारत के प्राचीन इतिहास की जानकारी के साधन संतोषप्रद नहीं
है। उनकी न्यूनता
के कारण अति प्राचीन भारतीय संस्कृति एवं शासन का क्रमवद्ध इतिहास नहीं
मिलता है। 13वीं सदी की पराजयों के बाद भी किस तरह राजपूतों और दक्षिण भारत के
क्षत्रियोँ ने अपने धर्म को बचाए रखा और 14वीं-15वीं सदी में कितने संघर्षो के बाद
वापसी कर मुस्लिम सल्तनत को उखाड़ कर उत्तर और दक्षिण भारत में सफलतापूर्वक हिन्दू
राज्य बनाए गए
, इनके
बारे में कहीँ
कम ही बताया जाता। आज हम एक ऐसे ही घटना के बारे मे
बताने जा रहे हैं जिसके बारे मे कई तरह की अफवाह हम सब के बीच परचलित है। ये कहानी
है चित्तोड़ की महारानी पद्मावती
, राजा रत्न सिंह, उसी राज्य के अत्यंत पराक्रमी और साहसी सेनापति गौरा बादल के बलिदान की।
ये काल चक्र है इस काल चक्र मे मैं आप सब का
अभिनंदन करता हूँ मै आशा करता हूँ की आप इस विडियो को पूरा देखने के बाद हमारे इस
चैनल को सुब्स्कृबे जरूर करेंगे और यूट्यूब के
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रानी पद्मावती ने अपना बचपन अपने पिता गंधर्वसेन और
माता चम्पावती के साथ सिंहाला में व्यतीत किया था। बाद मे रानी पद्मावती का विवाह
चित्तौड़ के राजा रावल रतन सिंह से हुआ और वो चित्तौड़ की महारानी हुई। रानी
पद्मावती अत्यंत हीं सुंदर स्त्री थीं। बात उस समय की है जब राजा रावल सिंह ने अपने
एक मुख्य संगीतकार राघव चेतन को अपने महल से निकाल दिया था। उस समय दिल्ली की
गद्दी पर अलाउद्दीन खिलजी का राज था। अपने अपमान और राज्य से निर्वासित किये जाने
पर राघव चेतन बदला लेने पर आतुर था। उसके जीवन का सिर्फ और सिर्फ एक ही लक्ष्य रह
गया था
, और वह था चित्तौड़ के महाराज रत्न सिंह की मृत्यु। अपने इसी उद्देश के साथ
वह दिल्ली चला गया। वहां जाने का उसका मकसद दिल्ली के बादशाह अलाउद्दीन खिलजी को
उकसा कर चित्तौड़ पर आक्रमण करवा कर अपना प्रतिशोध पूरा करने का था। वहाँ जा कर
उसने चित्तौड़ की महारानी पद्मावती के सौन्दर्य का बखान करना शुरू कर दिया। जिससे
ख्लिजी बहुत प्रभावित हुआ और रानी पद्मावती पर मोहित हो गया।
कुछ ही दिनों बाद अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ राज्य
पर आक्रमण करने का मन बना लिया और अपनी एक विशाल सेना लेकर चित्तौड़ राज्य की ओर चल
दिया। अलाउद्दीन खिलजी की सेना चित्तौड़ तक पहुँच तो गयी पर चित्तौड़ के किले की
अभेद्य सुरक्षा देख कर अलाउद्दीन खिलजी की पूरी सेना हैरान रह गयी। बहुत प्रयासो
के बावजूद वो किले को भेदने मे असफल रहते हैं। उन्होने वहीं किले के आस पास अपने
पड़ाव डाल लिए और चित्तौड़ राज्य के किले की सुरक्षा भेदने का उपाय ढूँढने लगे। अंत
मे उन्होने एक योजना बनाई और योजना के तहत --
अलाउद्दीन
खिलजी नें राजा रावल रत्न सिंह को संदेश भेजा
जिसमे
उसने रानी पद्मावती को देखने की इक्षा प्रकट की जिसको पहले तो राजपूत मर्यादा के
विरुद्ध बता कर राजा रत्न सिंह नें ठुकरा दिया। पर बाद मे
अलाउद्दीन खिलजी के आग्रह
और संधि के सुझाव पर राजा ने आईने मे रानी को दिखाने की बात सुविकर कर ली। उनके
सेनापति गौरा राजा की इस बात से सहमत नहीं थे। और राजा से रुष्ट भी हो गए थे। चित्तौड़
के महाराज ने अलाउद्दीन खिलजी को आईने में रानी पद्मावती का प्रतिबिंब दिखला दिया
और फिर अलाउद्दीन खिलजी को खिला-पिला कर पूरी महेमान नवाज़ी के साथ चित्तौड़ किले के
सातों दरवाज़े पार करा कर उनकी सेना के पास छोड़ने खुद गये। इसी अवसर का लाभ ले कर
कपटी अलाउद्दीन खिलजी नें राजा रावल रत्न सिंह को बंदी बना लिया और किले के बाहर
अपनी छावनी में कैद कर दिया। और इसके बाद संदेशा भिजवा दिया की अगर चित्तौड़ के
महाराज को जीवित देखना चाहते हो तो रानी पद्मावती को किले के बाहर ले आया जाए।
जब रानी पद्मावती को इस बात का पता चला तो वो बहुत
व्याकुल हो उठीं
, और राजा से रुष्ट हो चुके सेनापति
गौरा और उनके भतीजे बादल के पास गईं। और उनसे कहा की राज्य खतरे मे है आप ही इस
राज्य की रक्षा कर सकते हैं। राज्य की रानी के आग्रह पर गौरा बादल ने एक बड़ी ही
अद्भुत योजना बनाई। इस योजना के तहत किले के बाहर मौजूद अलाउद्दीन खिलजी तक यह
पैगाम भेजना था की रानी पद्मावती समर्पण करने के लिये तैयार है और पालकी में बैठ
कर किले के बाहर आने को राज़ी है। और फिर पालकी में रानी पद्मावती और उनकी सैकड़ों
दासीयों की जगह नारी भेष में लड़ाके योद्धा भेज कर बाहर मौजूद दिल्ली की सेना पर
आक्रमण कर दिया जाए और इसी अफरातफरी में राजा रावल रत्न सिंह को अलाउद्दीन खिलजी
की कैद से मुक्त करा लिया जाये।
ऐसा ही हुआ अलाउद्दीन खिलजी रानी पद्मावती पर इतना
मोहित था की उसने इस बात की पड़ताल करना भी ज़रूरी नहीं समझा की सभी पालकियों को
रुकवा कर यह देखे कि उनमें वाकई में दासियाँ ही है। कुछ ही देर में अलाउद्दीन
खिलजी नें रानी पद्मावती की पालकी अलग करवा दी और परदा हटा कर उनका दीदार करना
चाहा। तो उसमें से राजपूत सेनापति गौरा निकले और उन्होने आक्रमण कर दिया। उसी वक्त
चित्तौड़ सिपाहीयों नें भी हमला कर दिया भीषण युद्ध आरंभ हो गया... गौरा और बादल ने
शत्रु सेना मे कोहराम मचा दिया। चित्तौड़ की भूमि पर ऐसा खून खराबा कभी नहीं हुआ
था। वहाँ मची अफरातफरी के बीच बादल नें राजा रावल रत्न सिंह को बंधन मुक्त करा
लिया और उन्हे एक घोड़े पर बैठा कर सुरक्षित चित्तौड़ किले के अंदर पहुंचा दिया। चित्तौड़
के सेनापति गौरा और खिलजी के सेनापति जफर के बीच युद्ध अपने चरम पर पहुँच गया था
जफर ने गौरा का सर धड़ से अलग कर दिया इसके बावजूद गौरा के धड़ ने जफर का सर कट
दिया। उस युद्ध मे गौरा और बादल समेत सभी सैनिक शहीद हो गए इसप्रकार उन्होने अपने
राजा की रक्षा की थी।
खिलजी रानी पद्मावती के सौंदर्य पे इतना ज्यदा आकर्षित
था की वो  किले के बाहर इंतज़ार करता रहा।
बाद मे जब किले के अंदर भोजन सामग्री खत्म हो गई तब राजा रावल सिंह ने आर पर की
लड़ाई लड़ने का फैसला किया। और अपने सैनिकों के साथ खिलजी पर आक्रमण कर दिया लड़ते
लड़ते उन्होने युद्ध क्षेत्र मे अपने प्राण तयागे। जब रानी पद्मावती को राजा के
मृत्यु का समाचार मिला तो उन्होने राजपूतना रीति अनुसार वहाँ की सभी महिलाओं नें
जौहर करने का फैसला लिया।
जौहर की रीति निभाने के लिए नगर के बीच एक बड़ा सा
अग्नि कुंड बनाया गया और रानी पद्मावती और अन्य महिलायेँ एक के बाद एक  उस धधकती चिता में कूद कर अपने प्राणों की बलि
दे दी।
रानी पद्मावती और राजा रत्न सिंह के इस बलिदान की
गाथा पर समस्त राजपूतना गौरवान्वित हो उठा।
दोस्तों रानी पद्मावती के विषय मे हमारे द्वारा दी
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