Thursday, 26 September 2019

The Mysterious World of Great Aghori sadhu Revealed.... Life of Naga Sadhu

Aghoris are shamans. People who learn to navigate alternate conscious states. Whereas most people are confused by what they experience in dreams or during a drug -induced trip, aghoris learn to make sense out of it. This requires a lot of courage and the undisputed ability to trust the subconscious, this is why they have such harsh practises, which require the realizations that

  1. The reality we experience is absolutely objective.
  2. Most people condemn actions without ever having committed them.
The most important part about psychedelic trips is that they imitate death, and the aghoris survive harsh psychedelic overdoses. Often after the trip, they are convinced that they had died. That is why they put on human ash, to be as close to death as possible, their goal is to somehow learn the secrets of death or perhaps become immortal through yoga. Their entire discipline does not take any religion for granted or anything as truth before having experienced it for themselves. That is the truth about the aghoris, every truth is objective till experienced, even life.

Thursday, 29 August 2019

भगवान राम के जन्म की अद्भुत कथा... Story of Bhagwan Ram Kaal Chakra

शास्त्रों में लिखा है,“रमन्ते
योगिनः अस्मिन सा रामं उच्यते
अर्थात, योगी ध्यान में जिस शून्य में रमते हैं उसे राम कहते
हैं।
राम के चरित्र में भारत
की संस्कृति के अनुरूप पारिवारिक और सामाजिक जीवन के उच्चतम आदर्श पाए जाते हैं। उनमें
व्यक्तित्वविकास
,लोकहित तथा सुव्यवस्थित
राज्यसंचालन के सभी गुण विद्यमान थे। उन्होंने दीनों
, असहायों, संतों
और धर्मशीलों की रक्षा के लिए जो कार्य किए
, आचारव्यवहार
की जो परंपरा क़ायम की
, सेवा
और त्याग का जो उदाहरण प्रस्तुत किया तथा न्याय एवं सत्य की प्रतिष्ठा के लिए वे
जिस तरह अनवरत प्रयत्नवान्‌ रहे
, जिससे
उन्हें भारत के जन-जन के मानस मंदिर में अत्यंत पवित्र और उच्च आसन पर आसीन कर
दिया है।
बात उस समय की है जब महाराज दशरथ ने पुत्र प्राप्ति हेतु
यज्ञ आरंभ करने की ठानी। महाराज की आज्ञानुसार श्यामकर्ण घोड़ा चतुरंगिनी सेना के
साथ छुड़वा दिया गया। महाराज दशरथ ने समस्त मनस्वी
, तपस्वी, विद्वान ऋषि-मुनियों तथा वेदविज्ञ
प्रकाण्ड पण्डितों को यज्ञ सम्पन्न कराने के लिये बुलावा भेज दिया। निश्‍चित समय
आने पर समस्त अभ्यागतों के साथ महाराज दशरथ अपने गुरु वशिष्ठ जी तथा ऋंग ऋषि को
लेकर यज्ञ मण्डप में पधारे। इस प्रकार महान यज्ञ का विधिवत शुभारंभ किया गया।
सम्पूर्ण वातावरण वेदों की ऋचाओं के उच्च स्वर में पाठ से गूंजने तथा समिधा की
सुगन्ध से महकने लगा। समस्त पण्डितों
, ब्राह्मणों, ऋषियों आदि को यथोचित धन-धान्य, गौ आदि भेंट कर के सादर विदा करने के
साथ यज्ञ की समाप्ति हुई। राजा दशरथ ने यज्ञ के प्रसाद खीर को अपने महल में ले
जाकर अपनी तीनों रानियों में वितरित कर दिया। प्रसाद ग्रहण करने के परिणामस्वरूप
तीनों रानियों ने गर्भधारण किया।




जब
चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र में सूर्य
, मंगल शनि, वृहस्पति तथा शुक्र अपने-अपने उच्च
स्थानों में विराजमान थे
, कर्क लग्न का उदय होते ही महाराज दशरथ की बड़ी रानी कौशल्या के गर्भ
से एक शिशु का जन्म हुआ जो कि नील वर्ण
, चुंबकीय आकर्षण वाले, अत्यन्त तेजोमय, परम कान्तिवान तथा अत्यंत सुंदर था। उस
शिशु को देखने वाले देखते रह जाते थे। इसके पश्चात् शुभ नक्षत्रों और शुभ घड़ी में
महारानी कैकेयी के एक तथा तीसरी रानी सुमित्रा के दो तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ।
चारो पुत्रों के जन्म से पूरी अयोध्या में उत्स्व मनाये जाने लगे
| राजा दशरथ के पिता बनने पर देवता भी
अपने विमानों में बैठ कर पुष्प वर्षा करने लगे
| अपने पुत्रों के जन्म की खुशी में राजा
दशरथ ने अपनी प्रजा को बहुत दान
दक्षिणा दी|

पुत्रों
के नामकरण के लिए महर्षि वशिष्ठ को बुलाया गया तथा उन्होंने राजा दशरथ के चारों
पुत्रों के नामकरण संस्कार करते हुए उन्हें राम
, भरत, लक्ष्मण और शत्रुघ्न नाम दिए|
भारत
की प्राचीन नगरियों में से एक अयोध्या को हिन्दू पौराणिक इतिहास में पवित्र सप्त
पुरियों में अयोध्या
, मथुरा, माया (हरिद्वार), काशी, कांची, अवंतिका (उज्जयिनी) और द्वारका में शामिल किया गया है। अयोध्या को
अथर्ववेद में ईश्वर का नगर बताया गया है और इसकी संपन्नता की तुलना स्वर्ग से की
गई है।
त्रेतायुग मे भगवान राम का जन्म यही हुआ था।

Saturday, 27 July 2019

वैद्यनाथ धाम देवघर से जुड़ी हैरान कर देने वाली सच्चाई...Baidyanath dham s...

वैद्यनाथ
मन्दिर
भारत
के
12 ज्योतिर्लिंगों में झारखण्ड के देवघर
जिले में स्थित वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग शामिल है। विश्व के सभी शिव मंदिरों के
शीर्ष पर त्रिशूल लगा दीखता है मगर वैद्यनाथधाम परिसर के शिव
, पार्वती, लक्ष्मी-नारायण व अन्य सभी मंदिरों के शीर्ष पर पंचशूल लगे हैं। कहा
जाता है कि रावण पंचशूल से ही अपने राज्य लंका की सुरक्षा करता था।
यहाँ प्रतिवर्ष महाशिवरात्रि से 2
दिनों पूर्व बाबा मंदिर
, माँ पार्वती व लक्ष्मी-नारायण के मंदिरों से पंचशूल उतारे जाते हैं।
इस दौरान पंचशूल को स्पर्श करने के लिए भक्तों की भीड़ उमड़ पड़ती है।
 पंचशूल पंचतत्वों-क्षिति, जल, पावक, गगन तथा समीर से बने मानव शरीर का
द्योतक है. मान्यता है कि यहां आने वाला श्रद्धालु अगर बाबा के दर्शन किसी कारणवश
न कर पाए
, तो
मात्र पंचशूल के दर्शन से ही उसे समस्त पुण्यफलों की प्राप्ति हो जाती है.
सावन महीने में यह पूरा क्षेत्र
केसरिया पहने शिवभक्तों से पट जाता है. भगवान भोलेनाथ के भक्त 105 किलोमीटर दूर
बिहार के भागलपुर के सुल्तानगंज में बह रही उत्तर वाहिनी गंगा से जलभर कर पैदल
यात्रा करते हुए यहां आते हैं और बाबा का जलाभिषेक करते हैं.
 आइये सुनते हैं बैद्यनाथ धाम से
जुड़ी पौराणिक कथा क्या है
?
ये काल चक्र है...
एक
बार रावण कैलाश पर्वत पर जाकर शिवजी की तपस्या करने लगा। लेकिन बहुत समय बीत जाने
के बाद भी शिवजी प्रसन्न नहीं हुए।
अब रावण यहां से हटकर हिमालय पर्वत पर
पुन: उग्र तपस्या करने लगा
,
फिर भी उसे भगवान के दर्शन नहीं हो
सके। इस पर रावण ने अपने शरीर को अग्नि में भेंट करने की ठानी। उसने दस मस्तकों को
एक-एक कर काटकर अग्नि में डालने लगा। नौ मस्तक अग्नि में समर्पित कर रावण जब दसवें
को काटने के लिए तैयार हुआ तो शिवजी प्रसन्न होकर प्रकट हुए।
शिव
की कृपा से उसके सभी मस्तक अपने-अपने स्थान से जुड़ गए। हाथ जोड़ कर प्रार्थना
करते हुए रावण ने वर मांगा
'हे
प्रभो! मैं अत्यंत पराक्रमी होना चाहता हूं। आप मेरे नगर में चल कर निवास करें। यह
सुन कर शिवजी बोले
, 'हे रावण! तुम मेरे शिवलिंग को उठा कर ले जाओ और इसका पूजन
करना
, किन्तु
ध्यान रहे मार्ग में कहीं भी इसे रखा
तो
यह वहीं
स्थापित हो जाएगा।
दोवताओं से सोचा की यदि भगवान शिव कैलाश छोड़
कर चले गए तो इस पृथ्वी का संतुलन बिगड़ जाएगा और इस समस्या के समाधान के लिए
विष्णु जी के पास गये। देवतायों कि याचना पर विष्णु जी ने एक लीला रची
इधर रावण शिवलिंग लेकर लंका की ओर चल पड़ा। कुछ दूर चलने के बाद उसे
लघुशंका की इच्छा हुई। उसने वहां एक चरवाहा
जिसका
नाम बैजु था
, को देखकर कुछ देर के लिए लिंग को हाथ में रखने
की गुहार लगाई। चरवाहे ने उत्तर दिया कि यदि वह जल्दी लौटकर नहीं आएगा तो शिवलिंग
को वहीं पर रख देगा। इतना सुनकर रावण उसे शिवलिंग देकर लघुशंका करने गया।
इधर
चरवाहे
जो ई भगवान विष्णु ही थे उन्होने शिवलिंग को जमीन पर रख दिया। पृथ्वी
पर रखते ही शिवलिंग उसी स्थान पर दृढ़ता पूर्वक जम गया। लघुशंका से लौटने के बाद
रावण ने शिवलिंग को उठाने का अथक प्रयास किया लेकिन सफल नहीं हो सका। आखिर में वह
निराश होकर घर लौट गया। रावण के चले जाने पर सभी देवताओं ने वहां आकर शिवलिंग की
पूजा की। शिवजी ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए।
तब से यह
शिवलिंग ज्योतिर्लिंग के रूप मे प्रसिद्ध हो गया।

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