Sunday, 23 March 2025

महाभारता की रचना कैसे हुई ? Vyasa meets Ganesha | #mahabharat

हिमालय की गगनचुंबी पर्वत श्रृंखलाओं में, जहाँ शांति की धारा प्रवाहित होती है और जहाँ योगियों की साधना से आकाश भी मंत्रमुग्ध हो उठता है, वहीं ध्यानमग्न बैठे थे महर्षि वेदव्यास। सृष्टि के रहस्यों को जानने वाले इस महान तपस्वी को एक दिव्य प्रेरणा प्राप्त हुई। स्वयं ब्रह्मा जी ने उनके ध्यान में प्रकट होकर कहा, "व्यास! तुम्हें एक ऐसा ग्रंथ लिखना होगा, जो युगों-युगों तक मानवता का मार्गदर्शन करेगा। यह ग्रंथ होगा 'महाभारत'"

वेदव्यास समझ गए कि यह कार्य अत्यंत कठिन है। महाभारत केवल एक कथा नहीं थी; यह एक महासागर था, जिसमें प्रेम था, घृणा थी, राजनीति थी, त्याग था, छल था और सबसे बढ़कर जीवन का गूढ़ सत्य था। वेदव्यास को भली-भाँति ज्ञात था कि इस महाकाव्य का लेखन केवल उनके बलबूते का कार्य नहीं। उन्हें किसी ऐसे की सहायता की आवश्यकता थी जो उनकी गति से चल सके, जो उनके शब्दों को अक्षरों में सके।


Monday, 3 March 2025

Sunday, 2 October 2022

महादेव और भक्षासूर का महाप्रलयंकारी युद्ध Mukteshwar मे हुआ था ? Battle ...

Mukteshwar Nainital

क्या आपको पता है पुरातन काल मे एक ऐसा राक्षस भी था जिसे स्वयं भगवान महादेव भी युद्ध मे परास्त नहीं कर पाये थे जी हाँ एक ऐसा राक्षस जो इतना शक्तिशाली था की सारे देवी देवता उसके भय से काँपते थे ? आज इस विडियो मे हम भगवान महादेव और भक्षासूर के बीच हुए महाभ्यंकर युद्घ की कहानी सुनेंगे और जानेंगे की आखिर क्यू भगवान महादेव भी उसे परास्त नहीं कर पाये ।

ये काल चक्र है...

बात उस समय की है जब भक्षासूर नमक एक राक्षस ब्रह्मा जी की कठोर तपस्या मे लिन हो गया सारे देवी देवताओं को यह भय सताने लगा की अगर इस राक्षस की तपस्या सफल हो गयी और ब्रह्मा जी इस राक्षस से प्रसन्न हो गए तो क्या होगा ? इस पृथ्वी पर विनाश लीला शुरू हो जाएगी और इसी भय से उन्होने भक्षासूर की तपस्या को रोकने के लिए कई प्र्यतन लेकिन भक्षासूर की तपस्या इतनी कठोर थी की उनके सारे प्र्यतन विफल हो गए और आखिर कर भगवान ब्रह्मा जी उसकी तपस्या से प्रसन्न हुए।

भक्षासूर के समक्ष आ कर ब्रह्मा जी बोले – वत्स मै तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हुआ मगो क्या वर मांगते हो

भक्षासूर बोला – भगवान मुझे तो अमर होना कृपया मुझे अमरता का वरदान दीजिये

ब्रह्मा जी ने कहा – इस धरती पर जिसका भी जन्म हुआ है उसकी मृत्यु तय है इस लिए अमरता जैसी कोई बात अस्तित्व मे ही नही रखती है कुछ और वर मांगो

भक्षासूर ने काफी सोच विचार कर बोला भगवान मुझे ऐसा वर दो जिससे मुझे कोई भी देवी या देवता युद्ध मे परास्त न कर सके।

ब्रह्मा जी ने तथास्तु कहा और अंतर्ध्यान हो गए ।

वरदान पा कर भक्षासूर खुद को तीनों लोको का स्वामी समझने लगा उसके अत्याचार की सीमा बढ़ने लगी चरो ओर हाहाकार मच गया उसने स्वर्ग पर भी अपना आधिपत्य स्थापित कर लिया। सारे देवता तब भगवान विष्णु के पास गए उन्होने उन्हे भगवान महादेव के पास जाने की सलाह दी, तब सारे देवता भगवान महादेव के पास पहुंचे।

भगवन महादेव ने देवताओं को आश्वासन दिया की वो अब उस राक्षस से युद्ध करेंगे और उसे परास्त कर देंगे। महादेव उस राक्षस की तलाश में निकल पड़ते हैं, ऋषि मुनियों पर अत्याचार करते हुए भक्षासुर उत्तराखंड के जंगलों में पहुँच गया तभी महादेव वहां प्रकट हुए

सुबह के उगते हुए सूरज की लालिमा के साथ बर्फ की सफेद चादर ओढ़े शानदार हिमालय की पर्वत श्रृंखलाओं के मंत्रमुग्ध कर देने वाले दृश्य।इसके साथ-साथ ऊंचे-ऊंचे देवदार के घने पेड़ों के बीच से गुजरती हुई ठंडी ठंडी बर्फीली हवायें।कठफोड़ा ,नीलकंठ आदि जैसे अनेक पक्षियों का सुबह-सुबह का मधुर कलरव। अगर आप भी मुक्तेश्वर घूमने आना चाहते हैं तो हम आपको रेकमेंड करना चाहते हैं Tree House रिसोर्ट मुक्तेश्वर यह एक eco फ्रेंडली रिसोर्ट है जिस के कंस्ट्रक्शन में पेड़ों को न काटना पड़े उस के लिए पेड़ों को ही कमरे में से निकल दिय यहाँ हर कमरे में एक जिन्दा पेड़ है जिसकी खूबसूरती देखने लायक है यहाँ से नंदा देवी, त्रिशूल पचचूली जैसी हिमालय की पर्वत श्रृंखलाएं दिखती है और हर तरफ silver oak के जंगल हैं हर पर्यटक को कम्प्लीमेंट्री नेचर ट्रैकिंग भी कराते हैं।  

अब अपनी कहानी पर वापिस आते हैं

महादेव ने भक्षासुर से कहा अरे मुर्ख तू क्यों इन लोगों पर इतना अत्याचार कर रहा है अगर तू इतना ही शक्तिशाली है तो मुझसे युद्ध कर। भक्षासुर तत्काल युद्ध के लिए सुसज्जित हो गय।  भगवन महादेव और भक्षासुर के बिच भयंकर युद्ध प्रारम्भ हो गया। दोनों तरह से भीषण अस्त्रों का प्रयोग शुरू हो गया भक्षासुर ने महादेव पर अपने दिव्यास्त्रों का प्रयोग शुरू कर दिया महादेव ने उन अस्त्रों का प्रतिउत्तर दिया और भक्षासुर के सरे दिव्यास्त्रों को विफल कर दिया। महादेव ने भी भक्षासुर पर अनेक अस्त्रों से प्रहार किया लेकिन भक्षासुर पर वरदान के कारण उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा था युद्ध का कोई अंत नहीं दिख रहा था सारी पृथ्वी युद्ध के कारण विनाश की ओर बढ़ रही थ।

तब महादेव ने भक्षासुर से कहा -- भक्षासुर मै तेरे युद्ध कौशल से प्रसन्न हूँ बता क्या वर मांगता है

भक्षासुर ने कहा - भगवन आपसे युद्ध कर के मै धन्य हो गया मुझे अब कोई इच्छा नहीं है मुझे अपने चरणों में मुक्ति दीजिये प्रभु।

भगवन महादेव ने भक्षासुर को मुक्ति प्रदान की और तब से ही वो जगह मुक्तेश्वर धाम ने नाम से प्रशिद्ध हो गय।  भक्षासुर को मुक्ति देने के बाद भगवन महादेव ने उसी जगह तपस्या में लीन हो गए कुछ समय पश्चात् वहां से गुरु गोरखनाथ गुजर रहे थे

गुरु गोरखनाथ के मार्ग में ही भगवन महादेव तपस्या में लीन थे उन्होंने सोचा की कही भगवन का ध्यान भांग न हो जाये इसीलिए उन्होंने वही एक पत्थर पर रास्ता बनाने के लिए अपने फरसे से प्रहार किया और एक छिद्र का निर्माण हो गया उस प्रहार से भगवन की तपस्या भांग हो गयी भगवन महादेव क्रोधित हो गए तब गुरु गोरखनाथ ने भगवन को प्रसन्न करने के लिए उनकी स्तुति की भगवन ne उनकी स्तुति से प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया की जो भी निःसंतान स्त्री शिवरात्रि के दिन इस छिद्र के बिच से निकल जाएगी उसे संतान की प्राप्ति अवश्य होगी आज भी ये छिद्र मुक्तेश्वर धाम में मौजूद है  

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

Saturday, 27 November 2021

भगवान शिव और परशुराम जी बीच युद्ध क्यूँ हुआ था ? Bhagwan Shiva vs Parshuram

परशुराम और शिव जी का युद्ध

अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनुमांश्च विभीषण:

कृप: परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविन:।।

अश्वत्थामा, हनुमान और विभीषण की भांति परशुराम भी चिरजीवी हैं। भगवान परशुराम तभी तो राम के काल में भी थे और कृष्ण के काल में भी उनके होने की चर्चा होती है। कल्प के अंत तक वे धरती पर ही तपस्यारत रहेंगे।

परशुप्रतीक है पराक्रम का। रामपर्याय है सत्य सनातन का। इस प्रकार परशुराम का अर्थ हुआ पराक्रम के कारक और सत्य के धारक। शास्त्रोक्त मान्यता है कि परशुराम भगवान विष्णु के छठे अवतार हैं, अतः उनमें आपादमस्तक विष्णु ही प्रतिबिंबित होते हैं, एक व्याख्या यह है कि परशुमें भगवान शिव समाहित हैं और राममें भगवान विष्णु। इसलिए परशुराम अवतार भले ही विष्णु के हों, किंतु व्यवहार में समन्वित स्वरूप शिव और विष्णु का है। इसलिए परशुराम हरिहरस्वरूप हैं।

परंतु पुरानो मे शिव जी और पारसुरम जी के बीच युद्ध का भी वृतांत मिलता है तो आकीर क्यू हुआ था यह युद्ध भगवान शिव ने इस युद्ध के मद्यम से समाज को क्या संदेश देना चाहते थे और इस युद्ध का इस पृथ्वी पर क्या प्रभाव पड़ा

परशुराम उन दिनों शिव से शिक्षा ग्रहण कर रहे थे. भगवान शिव अपने शिष्य को परखने के लिए परशुराम की समय-समय पर परीक्षा लिया करते थे. एक दिन शिव ने परशुराम की परीक्षा लेने के लिए निति के विरुद्ध कुछ कार्य करने का आदेश दिया. पहले परशुराम को कुछ संकोच हुआ परन्तु फिर उन्होंने भगवान शिव से साफ़ साफ़ कह दिया की वे वह कार्य नहीं करेंगे जो निति के विरुद्ध हो. वह लड़ने को खड़े हो गए और समझाने बुझाने से भी नहीं माने. महादेव शिव से ही भीड़ गए.

भगवान शिव और परशुराम दोनों के मध्य भयंकर युद्ध छिड़ गया. परशुराम ने पहले बाणों से शिव पर प्रहार किया जो शिव ने अपने त्रिशूल से काट डाले. अंत में अति क्रोधित परशुराम ने अपने फरसे का प्रयोग किया. परशुराम ने महादेव शिव पर उनके ही दिए फरसे से प्रहार कर दिया. क्योकि शिव को अपने अस्त्र का मान रखना था था उन्होंने उस अस्त्र के प्रहार को अपने ऊपर ले लिया. भगवान शिव के मष्तक पर बहुत गहरी चोट लगी. भगवान शिव के एक नाम खण्डपरशु का यही रहस्य है.

भगवान शिव ने परशुराम के फरसे के उस प्रहार का बुरा नहीं माना बल्कि परशुराम को अपने गले से लगा लिया. और कहा अन्याय करने वाला चाहे कितना ही बड़ा क्यों न हो, धर्मशील व्यक्ति को अन्याय के विरुद्ध खड़ा होना चाहिए, यह उसका कर्तव्य है.संसार में अधर्म मिटाने से मिटेगा सहने से नहीं. इसके बाद भगवान शिव ने नैतिक उपदेश देते हुए परशुराम से कहा की केवल धर्म, तप, जप, दान, व्रत, उपवास धर्म के लक्षण नहीं है . अन्याय अधर्म से लड़ना भी धर्म साधना का एक हिस्सा है.

Monday, 27 September 2021

वैज्ञानिकों ने भी माना जिन्दा है हनुमान जी ! मिल गया सबूत || Is Lord Han...

क्या हनुमान जी सच में जीवित हैं?

 

हिंदू धर्म के सबसे माने हुए भगवान हनुमान की करोड़ों भक्‍त पूजा करते हैं। उनपर विश्‍वास करते हैं, आस्‍था रखते हैं। हर युग में इनसे भक्‍तों ने साहस, पराक्रम, ताकत, मासूमियत, करुणा और निस्‍वार्थ होने की सीख ही ली है। इनको लेकर सिर्फ इतना ही सच नहीं है। इनसे जुड़ा एक सच ये भी है हिंदुओं के ये भगवान आज भी जीवित हैं। आइए, गौर करें उन संकेतों पर जो ये साबित कर रहे हैं कि आज भी भगवान हनुमान अस्‍तित्‍व में हैं।

 

ऐसे हैं प्रमाण

इसका सबसे पहला प्रमाण तो ये ही है कि हममें से हर किसी ने भगवान राम और भगवान श्री कृष्‍ण के धरती से जाने की कहानियां सुनी हैं, लेकिन आज तक क्‍या किसी ने हनुमान के यहां से जाने की कोई कहानी सुनी है। न ही तो इससे जुड़ी किसी जानकारी का जिक्र किसी हिंदू ग्रंथ में किया गया है। इसके अलावा और भी हैं कुछ तथ्‍य हैं, जो ये साबित करते हैं कि आज भी भगवान हनुमान धरती पर अस्‍तित्‍व में हैं।

 

1 . चिरंजीवी हैं हनुमान

कहा जाता है कि हनुमान जी चिरंजीवी हैं। चिरंजीवी का हिंदी में मतलब होता है शाश्‍वत। इसका मतलब होता है, हमेशा अस्‍तित्‍व में रहने वाला। कुल मिलाकर हनुमान जी को हिंदू पुराणों के अनुसार इस धर्म के सभी भगवानों में से एकमात्र हमेशा धरती पर रहने वाला भगवान माना गया है। बताया जाता है कि वह इस धर्म के आठ महान शाश्‍वत किरदारों में से एक हैं।

 

2 . इनके जाने की कहानी नहीं है पुराणों में भी

बंदरों के भगवान, जिनके बारे में हम रामायण और महाभारत के समय से अपने इर्द-गिर्द होने को लेकर सुनते आए हैं। इनके अस्‍तित्‍व को हम त्रेता युग में भगवान राम के साथ होने से लेकर जानते हैं। इनके होने के प्रमाण द्वापर युग तक के मिले हैं, जो भगवान श्रीकृष्‍ण का समय था। अभी भी कलयुग में इनके होने के प्रमाण मिले हैं।

 

3 . हनुमान मंदिरों के आसपास हमेशा मिलेंगे बंदर

ये बात भी महज इत्‍तेफाक नहीं हो सकती कि ज्‍यादातर हनुमान मंदिरों के बाहर बंदरों की भीड़ लगी होती है। न यकीन हो तो किसी भी बड़े या छोटे हनुमान मंदिर के पास जाकर देखिए। आपको वहां बंदरों का झुंड बेहद आसानी से उछलकूद करता नजर आ जाएगा। इसका नजारा आप खुद ही इनके मंदिर के पास जाकर देख सकते हैं।

4 . इस बात के भी हैं साक्ष्‍य

इस बात के भी जबरदस्‍त साक्ष्‍य हैं कि पवनपुत्र का अस्‍तित्‍व अभी भी दुनिया में बरकरार है, लेकिन वह आसानी से सामान्‍य लोगों की आंखों से नजर नहीं आते। वैदिक पुराणों में बताया गया है कि उनके साक्षात दर्शनों के लिए सच्‍ची भक्‍त और भगवान राम से सच्‍ची लगन की जरूरत पड़ती है।

 

5 . राम नाम करेगा इनके दर्शन में मदद

कहते हैं कि जहां कहीं भी भगवान राम का नाम लिया जाता है, हनुमान जी की उपस्‍थित वहां पर जरूर होती है। एक सच्‍चा राम भक्‍त जब पूरी श्रद्धा उन्‍हें याद करता है, तो उसे भगवान हनुमान दर्शन जरूर देते हैं और हमेशा उसके आसपास रहते हैं। इस कहानी में भी उतनी ही सत्‍यता है, जितनी अन्‍य साक्ष्‍यों में।

Thursday, 9 September 2021

हनुमान जी और नागराज वासुकि के बीच महाप्रलयंकारी युद्ध क्यों हुआ ? Lord H...

हनुमान जी और नाग वशूकी युद्ध

हनुमान वानर योनि के होकर भी, मनुष्य की भाँति, अपनी बौद्धिक, मानसिक क्षमताओं का विकास करने में सफल रहे और अपनी लगन, श्रद्धा, कर्मठता, सज्जनता, ब्रह्मचर्य, साहस, वीरता, सेवा आदि सद्गुणों से देवताओं की भाँति पूजित हुए। हमें उनसे प्रेरणा लेनी चाहिए। हनुमान जी भक्तों के हित के लिए सतत संकल्पित हैं। भक्त जिस हाल में भी उनको पुकारता है वे उसके संकटों को दूर करने में लग जाते हैं। भक्त की एक भावभरी पुकार से भी वे उसकी आराधना को स्वीकार कर लेते हैं. हनुमानजी के जीवन की सबसे बड़ी विशेषता निरअंहकारिता थी ।जिसका आशय है कि वो तो इतने ताकतवर थे कि वो सूरज तक को खा गये थे,वो सब कुछ कर सकते थे,मगर कभी भी उन्होंने अंहकार नहीं किया ।इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है कि जब उन्होंने सहस्त्र योजन समुद्र को पारकरके,सीताजी का पता लगा लिया,लंका दहन कर दिया और माँ सीता की अँगुठी लाकर अपने प्रभु राम को सीताजी के विषय में अवगत कराया और फिरभी श्रीरामजी के पूछने पर वो बार-बार यही कहते रहे कि ये तो मैंने नहीं किया,ये तो सब आपने किया है प्रभु।ये सब आपकी कृपा है।इसमें मेरा कोई योगदान नहीं है।हम सभीको हनुमानजी से ये सीख लेनी चाहिए कि अपने अन्दर के अंह भाव को जला दें और हमेशा विनम्र होकर रहना सीखें। पौराणिक पत्रों मे एक पत्र है नाग वासुकि  धर्म ग्रंथों में वासुकि को नागों का राजा बताया गया है। धर्म ग्रंथों के अनुसार समुद्रमंथन के समय नागराज वासुकी की नेती बनाई गई थी। त्रिपुरदाह के समय वासुकि शिव धनुष की डोर बने थे।

दोस्तों क्या आपको पता रामायण काल मे एक वक्त ऐसा भी आया था जब नाग वासुकि और hanuman ji के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया था आखिर कौन विजयी हुआ इस युद्ध मे ? वशूकी नाग और hanuman ji मे कौन अधिक शक्तिशाली हैं ?

बात तब की है जब सुंदरकांड में हनुमानजी सीता की खोज में समुद्र पार कर रहे थे, तब उन्हें कई समस्याओं का सामना करना पड़ा। सुरसा और सिंहिका नाम की राक्षसियों ने हनुमानजी को समुद्र पार करने से रोका था,हनुमानजी ने समुद्र पार करते समय सुरसा से लड़ने में समय नहीं गंवाया। सुरसा हनुमान को खाना चाहती थी। उस समय हनुमानजी ने अपनी चतुराई से पहले अपने शरीर का आकार बढ़ाया और अचानक छोटा रूप कर लिया। छोटा रूप करने के बाद हनुमानजी सुरसा के मुंह में प्रवेश करके वापस बाहर आ गए। हनुमानजी की इस चतुराई से सुरसा प्रसन्न हो गई और रास्ता छोड़ दिया।

आगे चलते हुए उनका सामना नाग राज वासुकि से हुआ, नागराज वासुकि ने देखा की आज तक इस समुद्र को कोई पर नहीं कर पाया है फिर यर कौन वानर है जो उड़ता चला जा रहा है इसी कौतूहल वश नाग राज वासुकि हनुमान जी के समक्ष प्रकट हो गए और उनसे सवाल किया आप कौन हैं और कहा जा रहे हैं ... हनुमान जी यहाँ भी समय नही गवाना चाहते थे और उन्होने ने सोचा की ये कोई साधारण नाग है उन्होने बिना परिचय दिये ही आगे बढ़ गए। नाग राज वशूकी को क्रोध आ गया उन्होने हनुमान जी को अपने पुंछ मे बांध लिया। हनुमान जी समझ गए ये कोई साधारण नाग नहीं है हनुमान जी ने अपनी शक्ति दिखाई और किसी तरह नाग राज वशूकी के बंधन से खुद को मुक्त किया। नागराज वासुकि और हनुमान जी के बीच घमासान युद्ध प्रारम्भ हो गया। उसके बाद नागराज वासुकि ने कई बार हनुमान जी को बांधने का प्रयास किया लेकिन हनुमान जी हर बार उनके प्रहार से बच निकलते। हनुमान जी ने अपनी गदा का प्रहार नाग राज वासुकि पर किया लेकिन उस भयंकर गदा प्रहार के बावजूद वशूकी पर इसका असर नहीं हुआ वशूकी नाग की शक्ति का नदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं की उनही को समुद्रमन्थन के दौरान मंदरचल पर्वत मे बांध कर समुद्रमन्थन किया गया था। हनुमान जी और नाग वासुकि का युद्ध अपने चरम पर पहुँच गया था तभी भगवान शिव का आगमन हुआ... नाग वशूकी पर भगवान शिव की असीम कृपा है और हनुमान जी भगवान शिव के अंसअवतार हैं इसीलिए दोनों के इस युद्ध को रोकने के लिए भगवान शिव स्वयं उपस्थित हुए तब जा कर हनुमान जी को और नागराज वशूकी को एक दूसरे के विषय मे ज्ञात हुआ। नागराज वासुकि ने हनुमान जी से माफी मांगी और उनका रास्ता छोड़ दिया हनुमान जी अपने गंतव्य की ओर आगे बढ़े.....   

 

 

कलयुग में नारायणी सेना की वापसी संभव है ? The Untold Story of Krishna’s ...

क्या महाभारत युद्ध में नारायणी सेना का अंत हो गया ... ? या फिर आज भी वो कहीं अस्तित्व में है ... ? नारायणी सेना — वो ...