Tuesday, 31 December 2019
PUBG कौन खेल रहा है ? PUBG Mobile Puzzle | Best Riddles in Hindi | Think...
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पजल पहेली
Thursday, 26 December 2019
कृष्ण मित्र अर्जुन और रावण पुत्र इंद्रजीत के बीच युद्ध में कौन विजयी होत...
अर्जुन और इंद्रजीत
महाभारत और रामायण सिर्फ एक कथा नहीं है, ना ही वह एक ग्रन्थ है। यह
हमारा वास्तविक जीवन है जो हर युग में, हर क्षेत्र में अपने आप को दोहराता है। कर्म करना हर जीव का धर्म है। भूल एक परिणाम है पाप नहीं।
लेकिन भूल को बार बार दोहराना और उस पर पश्चतवा न करना पाप अवश्य है। लेकिन इस पाप
को सुधारने के लिए ईश्वर स्वयं हमारे समक्ष कई रूपों में आ जाते हैं। उन्हें
पहचाना भी हमारा कर्म हैं। वे हमें हमारी भूल सुधारने के कई मार्ग सामने रखते हैं। कौनसा मार्ग चुनना
हमारा कर्म है। चाहे आस्तिक हो या नास्तिक, एक न एक दिन हमें हमारे इस शरीर को त्यागना ही है। हमारे कर्म हमारे शरीर
त्यागने के मार्ग तय करेगा। दोस्तों
हमने अपने कई विडियो मे रामायण और महाभारत के पात्रो की तुलना की है आज उसी कर्म
को आगे बढ़ाते हुए हम एक बार फिर इन दोनों ग्रंथो के दो महान पात्रो की तुलना
करेंगे। पहला नाम है महाभारत का महान धनुर्धर अर्जुन और दूसरा नाम है रावण का
महाप्रतापी पुत्र इंद्रजीत। आइये दोनों योद्धाओं की काबलियत पर बात करते हैं और ये
समझने का प्रयास करते हैं की कौन किससे श्रेष्ठ है।
हमारा वास्तविक जीवन है जो हर युग में, हर क्षेत्र में अपने आप को दोहराता है। कर्म करना हर जीव का धर्म है। भूल एक परिणाम है पाप नहीं।
लेकिन भूल को बार बार दोहराना और उस पर पश्चतवा न करना पाप अवश्य है। लेकिन इस पाप
को सुधारने के लिए ईश्वर स्वयं हमारे समक्ष कई रूपों में आ जाते हैं। उन्हें
पहचाना भी हमारा कर्म हैं। वे हमें हमारी भूल सुधारने के कई मार्ग सामने रखते हैं। कौनसा मार्ग चुनना
हमारा कर्म है। चाहे आस्तिक हो या नास्तिक, एक न एक दिन हमें हमारे इस शरीर को त्यागना ही है। हमारे कर्म हमारे शरीर
त्यागने के मार्ग तय करेगा। दोस्तों
हमने अपने कई विडियो मे रामायण और महाभारत के पात्रो की तुलना की है आज उसी कर्म
को आगे बढ़ाते हुए हम एक बार फिर इन दोनों ग्रंथो के दो महान पात्रो की तुलना
करेंगे। पहला नाम है महाभारत का महान धनुर्धर अर्जुन और दूसरा नाम है रावण का
महाप्रतापी पुत्र इंद्रजीत। आइये दोनों योद्धाओं की काबलियत पर बात करते हैं और ये
समझने का प्रयास करते हैं की कौन किससे श्रेष्ठ है।
अर्जुन अपने समय के सबसे शक्तिशाली धनुर्धर योद्धा थे। वे सव्यसाची
थे, अर्थात दोनो
हाथों से समान बाण चला सकते थे, दो मील दूर तक वार कर सकते थे, शब्दभेदी बाण चला
सकते थे, अंधेरे में युद्ध
कर सकते थे, निद्रा पर विजय
प्राप्त कर देर तक युद्ध कर सकते थे, अपनी एकाग्रता व अचूक निशाने के लिए प्रसिद्ध थे। उनके बाजु
इतने शक्तिशाली थे की सामान्य धनुष आसानी से टूट जाते थे। उनका दिव्य धनुष गांडीव
इतना भारी था कि उसको उठाना या उसपर प्रत्यंचा चढ़ाना सामान्य बात नहीं थी, और उसपर
प्रत्यंचा अर्जुन के अलावा केवल श्रीकृष्ण व भीम ही चढ़ा सकते थे।
थे, अर्थात दोनो
हाथों से समान बाण चला सकते थे, दो मील दूर तक वार कर सकते थे, शब्दभेदी बाण चला
सकते थे, अंधेरे में युद्ध
कर सकते थे, निद्रा पर विजय
प्राप्त कर देर तक युद्ध कर सकते थे, अपनी एकाग्रता व अचूक निशाने के लिए प्रसिद्ध थे। उनके बाजु
इतने शक्तिशाली थे की सामान्य धनुष आसानी से टूट जाते थे। उनका दिव्य धनुष गांडीव
इतना भारी था कि उसको उठाना या उसपर प्रत्यंचा चढ़ाना सामान्य बात नहीं थी, और उसपर
प्रत्यंचा अर्जुन के अलावा केवल श्रीकृष्ण व भीम ही चढ़ा सकते थे।
मेघनाद पितृभक्त पुत्र था।उसे यह पता चलने पर की राम
स्वयं भगवान है फिर भी उसने पिता का साथ नही छोड़ा। मेघनाद की भी पितृभक्ति प्रभु
राम के समान अतुलनीय है। जब उसकी मां मन्दोदरी ने उसे यह कहा कि इंसान मुक्ति की
तरफ अकेले जाता है तब उसने कहा कि पिता को ठुकरा कर अगर मुझे स्वर्ग भी मिले तो
मैं ठुकरा दूँगा। अपने पिता की तरह
यह भी स्वर्ग विजयी था। इंद्र को परास्त करने के कारण ही ब्रह्मा जी ने इसका नाम
इंद्रजीत रखा था। आदिकाल से अब तक यही एक मात्र ऐसा योद्धा है जिसे अतिमहारथी की
उपाधि दी गई है। इसका नाम रामायण में इसलिए लिया
जाता है क्योंकि इसने राम- रावण युद्ध में एहम भूमिका निभाई थी। इसका नाम उन
योद्धाओं में लिया जाता है जो की ब्रह्माण्ड अस्त्र, वैष्णव अस्त्र
तथा पाशुपात अस्त्र के धारक कहे जाते हैं। इसने अपने गुरु शुक्राचार्य के
सान्निध्य में रहकर तथा त्रिदेवों द्वारा कई अस्त्र- शस्त्र एकत्र किए। स्वर्ग में
देवताओं को हरा कर उनके अस्त्र शस्त्र पर भी अधिकार कर लिया।
स्वयं भगवान है फिर भी उसने पिता का साथ नही छोड़ा। मेघनाद की भी पितृभक्ति प्रभु
राम के समान अतुलनीय है। जब उसकी मां मन्दोदरी ने उसे यह कहा कि इंसान मुक्ति की
तरफ अकेले जाता है तब उसने कहा कि पिता को ठुकरा कर अगर मुझे स्वर्ग भी मिले तो
मैं ठुकरा दूँगा। अपने पिता की तरह
यह भी स्वर्ग विजयी था। इंद्र को परास्त करने के कारण ही ब्रह्मा जी ने इसका नाम
इंद्रजीत रखा था। आदिकाल से अब तक यही एक मात्र ऐसा योद्धा है जिसे अतिमहारथी की
उपाधि दी गई है। इसका नाम रामायण में इसलिए लिया
जाता है क्योंकि इसने राम- रावण युद्ध में एहम भूमिका निभाई थी। इसका नाम उन
योद्धाओं में लिया जाता है जो की ब्रह्माण्ड अस्त्र, वैष्णव अस्त्र
तथा पाशुपात अस्त्र के धारक कहे जाते हैं। इसने अपने गुरु शुक्राचार्य के
सान्निध्य में रहकर तथा त्रिदेवों द्वारा कई अस्त्र- शस्त्र एकत्र किए। स्वर्ग में
देवताओं को हरा कर उनके अस्त्र शस्त्र पर भी अधिकार कर लिया।
आइये दोस्तों दोनों ही
योद्धाओं की विशेषताओं पर नज़र डालते हैं और ये समझने का प्रयास करते हैं की कौन
अधिक श्रेष्ठ था।
योद्धाओं की विशेषताओं पर नज़र डालते हैं और ये समझने का प्रयास करते हैं की कौन
अधिक श्रेष्ठ था।
शिक्षा के आधार पर देखा जाए
तो दोनों को महान गुरुओं का सनीध्य मिला अर्जुन के गुरु थे गुरु द्रोण और इंद्रजीत
के गुरु थे गुरु शुक्राचार्य दोनों ही योद्धा शिक्षा के आधार पीआर समान ही नज़र आ
रहे हैं।
तो दोनों को महान गुरुओं का सनीध्य मिला अर्जुन के गुरु थे गुरु द्रोण और इंद्रजीत
के गुरु थे गुरु शुक्राचार्य दोनों ही योद्धा शिक्षा के आधार पीआर समान ही नज़र आ
रहे हैं।
अस्त्र शस्त्र
अर्जुन ने हिमालय पे तपस्या
कर के भगवान शिव से पासूप्तास्त्र प्राप्त कर लिया था। अग्नि देव से उन्होने
अगन्यासत्र प्राप्त किए थे। इंद्रा देव ने भी अनेकों दिव्यास्त्र अर्जुन को प्रदान
किए थे। अर्जुन के पास अक्षय तरकश और गाँडीव धनुष भी थे। वरुण देव ने उन्हे
नंदीघोष नामक विशाल रथ दिया था। अर्जुन के पास ब्रह्मास्त्र और ब्रहमशिरा अस्त्र
भी था।
कर के भगवान शिव से पासूप्तास्त्र प्राप्त कर लिया था। अग्नि देव से उन्होने
अगन्यासत्र प्राप्त किए थे। इंद्रा देव ने भी अनेकों दिव्यास्त्र अर्जुन को प्रदान
किए थे। अर्जुन के पास अक्षय तरकश और गाँडीव धनुष भी थे। वरुण देव ने उन्हे
नंदीघोष नामक विशाल रथ दिया था। अर्जुन के पास ब्रह्मास्त्र और ब्रहमशिरा अस्त्र
भी था।
परंतु इंद्रजीत के पास नारायण
अस्त्र ब्रह्मास्त्र और पसुप्तास्त्र था इन तीनों अस्त्र का एक साथ एक वायक्ति के
पास होना ही उस को अस्त्रों के मापदंड पर श्रेष्ठ बनाती है।
अस्त्र ब्रह्मास्त्र और पसुप्तास्त्र था इन तीनों अस्त्र का एक साथ एक वायक्ति के
पास होना ही उस को अस्त्रों के मापदंड पर श्रेष्ठ बनाती है।
हम सब को पता है की इंद्रजीत
एक मायावी योद्धा था उसने अपनी माया से अनेकों अनेक योद्धाओं को परास्त किया था
इसी माया के बल पर उसने स्वर्ग पर आक्रमण किया और इंद्रा तक को परास्त कर
दिया था परंतु अर्जुन के paas ऐसे अनेक अस्त्र थे जिससे वो किसी भी
माया को खतम कर सकता था। महाभारत युद्ध मे अर्जुन ने निवटकवच, चित्रा सेन जिसे मायावी असुरों को परास्त कर ये बात साबित केआर दी थी की
वो किसे से कम नहीं है, बात इंद्रा की हो तो अर्जुन ने
इंद्रप्रस्थ स्थापना और खंडाव दहन के समय इंद्रा तक को परास्त कर दिया था।
एक मायावी योद्धा था उसने अपनी माया से अनेकों अनेक योद्धाओं को परास्त किया था
इसी माया के बल पर उसने स्वर्ग पर आक्रमण किया और इंद्रा तक को परास्त कर
दिया था परंतु अर्जुन के paas ऐसे अनेक अस्त्र थे जिससे वो किसी भी
माया को खतम कर सकता था। महाभारत युद्ध मे अर्जुन ने निवटकवच, चित्रा सेन जिसे मायावी असुरों को परास्त कर ये बात साबित केआर दी थी की
वो किसे से कम नहीं है, बात इंद्रा की हो तो अर्जुन ने
इंद्रप्रस्थ स्थापना और खंडाव दहन के समय इंद्रा तक को परास्त कर दिया था।
अर्जुन और इंद्रजीत के विषय
मे आपके विचार अपने कमेंट बॉक्स मे लिखें
मे आपके विचार अपने कमेंट बॉक्स मे लिखें
कृष्ण मित्र अर्जुन और रावण पुत्र इंद्रजीत के बीच युद्ध में
कौन विजयी होता ??? Kaal
Chakra
कौन विजयी होता ??? Kaal
Chakra
Tuesday, 24 December 2019
Sunday, 15 December 2019
अर्जुन के महाविनाशकारी अस्त्र शस्त्र || Kaal Chakra
अर्जुन के महाविनाशकारी
अस्त्र शस्त्र
अस्त्र शस्त्र
वेदों में 18 युद्ध कलाओं के विषयों पर मौलिक ज्ञान अर्जित है। प्राचीन
वैदिक काल में सभी तरह के अस्त्र-शस्त्र थे। इसका उल्लेख वेदों में मिलता है।
हालांकि ये किस तकनीक से संचालित होते थे, यह शोध का विषय हो सकता है, लेकिन यह तो तय था कि वे सभी दिव्यास्त्र
मंत्रों की शक्ति से ही संचालित होते थे। जब हम बात
महाभारत की करेंगे तो हम ये जान
लेते हैं कि महाभारत में सबसे वीर और भगवान के निकटतम योद्धा की बात आती है तो
सबसे पहले नाम अर्जुन की ही आता है। अर्जुन की शक्ति का कई बार वर्णन हमें महाभारत
में मिलता है जिन्होंने एक बार विराट के युद्ध में लगभग सभी कौरवों (भीष्ण,कर्ण और
द्रोणाचार्य भी) को अकेले ही हरा दिया था। महाभारत के अंतिम निर्णायक युद्ध में भी
अर्जुन ने उन योद्धाओं का वध किया जो कि उस
समय समस्त संसार में शक्तिशाली थे। आइये जानते हैं अर्जुन के पास ऐसे कौन से अस्त्र थे जिससे
उन्होने इन महान हस्तियों को परास्त किया था।
वैदिक काल में सभी तरह के अस्त्र-शस्त्र थे। इसका उल्लेख वेदों में मिलता है।
हालांकि ये किस तकनीक से संचालित होते थे, यह शोध का विषय हो सकता है, लेकिन यह तो तय था कि वे सभी दिव्यास्त्र
मंत्रों की शक्ति से ही संचालित होते थे। जब हम बात
महाभारत की करेंगे तो हम ये जान
लेते हैं कि महाभारत में सबसे वीर और भगवान के निकटतम योद्धा की बात आती है तो
सबसे पहले नाम अर्जुन की ही आता है। अर्जुन की शक्ति का कई बार वर्णन हमें महाभारत
में मिलता है जिन्होंने एक बार विराट के युद्ध में लगभग सभी कौरवों (भीष्ण,कर्ण और
द्रोणाचार्य भी) को अकेले ही हरा दिया था। महाभारत के अंतिम निर्णायक युद्ध में भी
अर्जुन ने उन योद्धाओं का वध किया जो कि उस
समय समस्त संसार में शक्तिशाली थे। आइये जानते हैं अर्जुन के पास ऐसे कौन से अस्त्र थे जिससे
उन्होने इन महान हस्तियों को परास्त किया था।
1. इंद्र अस्त्र इन्द्र देवता
द्वारा संचालित किया जाता है। इसका एक बार किया गया प्रयोग आसमान से बाणों की
वर्षा कर देता है।
द्वारा संचालित किया जाता है। इसका एक बार किया गया प्रयोग आसमान से बाणों की
वर्षा कर देता है।
2. आग्नेय अस्त्र अग्नि देव द्वारा संचालित इस अस्त्र का प्रयोग एक ही बार
में हर जगह आग को फैलाने के लिए किया जाता है। इस अस्त्र का सामना सिर्फ वरुण यानि
जल अस्त्र ही कर सकता है।
में हर जगह आग को फैलाने के लिए किया जाता है। इस अस्त्र का सामना सिर्फ वरुण यानि
जल अस्त्र ही कर सकता है।
3. वरुण अस्त्र
यह अस्त्र वरुण यानि जल देवता द्वारा संचालित
किया जाता है। इसका प्रयोग करने से एक ही बार में बड़ी मात्रा में पानी को प्रवाहित
किया जा सकता है। मुख्यत: इस अस्त्र का प्रयोग आग्नेय अस्त्र के प्रभाव को रोकने
के लिए किया जाता है।
किया जाता है। इसका प्रयोग करने से एक ही बार में बड़ी मात्रा में पानी को प्रवाहित
किया जा सकता है। मुख्यत: इस अस्त्र का प्रयोग आग्नेय अस्त्र के प्रभाव को रोकने
के लिए किया जाता है।
4. वायु अस्त्र
पवन देव द्वारा संचालित इस अस्त्र का प्रयोग
करने से वायु तेज हवा में बहने लगती थी। वायु की गति इतनी तेज होती थी कि दुश्मन
तक कांप उठते थे।
करने से वायु तेज हवा में बहने लगती थी। वायु की गति इतनी तेज होती थी कि दुश्मन
तक कांप उठते थे।
5. सम्मोहन अस्त्र
इसका प्रयोग महायोद्धाओं तक को यह भूलने के लिए
मजबूर कर सकता था कि वह किससे और किस उद्देश्य के लिए लड़ रहे हैं। जो इस अस्त्र को
चलाता उसी के मोहपाश में बंधकर सब रह जाते थे।
मजबूर कर सकता था कि वह किससे और किस उद्देश्य के लिए लड़ रहे हैं। जो इस अस्त्र को
चलाता उसी के मोहपाश में बंधकर सब रह जाते थे।
6. अर्जुन के पास ब्रह्मास्त्र भी था
यह अस्त्र सबसे अधिक खतरनाक था। यह हर प्रकार
के अस्त्रों के प्रभाव को काट सकता था। इसके संचालक स्वयं ब्रह्मा थे। इस अस्त्र
का काट किसी के भी पास नहीं था
के अस्त्रों के प्रभाव को काट सकता था। इसके संचालक स्वयं ब्रह्मा थे। इस अस्त्र
का काट किसी के भी पास नहीं था
7. और कृष्ण के आदेश पर अर्जुन ने भगवान शिव से पसुपटसत्र भी
प्राप्त कर लिए थे।
प्राप्त कर लिए थे।
Friday, 13 December 2019
इंस्पेक्टर दबंग की जासूसी पहेलियाँ। कातिल कौन है ? Think Logical
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Wednesday, 11 December 2019
Wednesday, 4 December 2019
भगवान शिव और गणेश जी के बीच महाप्रलयंकारी युद्ध...
शिव और गणेश युद्ध
हिन्दू धर्म के अनुसार 35 करोड़ देवी
देवताओं में गणपति का स्थान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। वैसे तो सभी देवी–देवता एक समान
हैं किन्तु ब्रह्मा और विष्णु जी द्वारा दिए गए सर्वप्रथम पूजनीय देव के वरदान के
कारण शिवपुत्र को सर्वश्रेष्ठ देव स्वरुप में पूजा जाता है। उनकी पूजा आज भी हर घर, हर मंदिर, किसी भी शुभ
कार्य को करने से पहले की जाती है । भगवान गणेश हर रूप में पूजनीय हैं, उन्हें एक–दंत, सिद्धिविनायक, अष्टविनायक के
रूप में भी पूजा जाता है। दोस्तों आज
हम इस विडियो मे भगवान गणेश से जुड़ी एक रोचक कहानी सुनेंगे। क्या हुआ जब भगवान
गणेश का सामना स्वयं भगवान शिव से हो गया था।
देवताओं में गणपति का स्थान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। वैसे तो सभी देवी–देवता एक समान
हैं किन्तु ब्रह्मा और विष्णु जी द्वारा दिए गए सर्वप्रथम पूजनीय देव के वरदान के
कारण शिवपुत्र को सर्वश्रेष्ठ देव स्वरुप में पूजा जाता है। उनकी पूजा आज भी हर घर, हर मंदिर, किसी भी शुभ
कार्य को करने से पहले की जाती है । भगवान गणेश हर रूप में पूजनीय हैं, उन्हें एक–दंत, सिद्धिविनायक, अष्टविनायक के
रूप में भी पूजा जाता है। दोस्तों आज
हम इस विडियो मे भगवान गणेश से जुड़ी एक रोचक कहानी सुनेंगे। क्या हुआ जब भगवान
गणेश का सामना स्वयं भगवान शिव से हो गया था।
एक समय की बात है। मां पार्वती स्नान के लिए जा रही थीं, तब अपनी विजया आदि
सखियों के कहने पर एक पुतले का निर्माण किया। उस पुतले में माता ने पंचवायु तथा
प्राण आदि डाल कर उसमें परम तेजस्वी ओज का आवाहन किया। वह पुतला सुन्दर बाल पुरुष
में परिवर्तित हो गया। मां पार्वती ने उस बालक को
सुन्दर मनोहारी वस्त्र आभूषण आयुध आदि प्रदान किया। माता ने उस पुतले से कहा, तुम मेरे पुत्र
हो और आज से तुम्हारा नाम गणेश होगा। इस तरह दोनों के बीच एक प्रगाढ़ संबंध का भी
अविर्भाव हुआ
सखियों के कहने पर एक पुतले का निर्माण किया। उस पुतले में माता ने पंचवायु तथा
प्राण आदि डाल कर उसमें परम तेजस्वी ओज का आवाहन किया। वह पुतला सुन्दर बाल पुरुष
में परिवर्तित हो गया। मां पार्वती ने उस बालक को
सुन्दर मनोहारी वस्त्र आभूषण आयुध आदि प्रदान किया। माता ने उस पुतले से कहा, तुम मेरे पुत्र
हो और आज से तुम्हारा नाम गणेश होगा। इस तरह दोनों के बीच एक प्रगाढ़ संबंध का भी
अविर्भाव हुआ
ठीक उसी समय पार्वती ने अपने पुत्र गणेश से कहा, जब तक मैं इस
गुफा से बाहर न निकलूं, तब तक तुम मेरी
रक्षा करना और द्वारपाल का कर्तव्य निभाना। पार्वती ने अपने पुत्र गणेश को यह भी
कहा कि गुफा में मेरी अनुमति के बिना कोई भी प्रवेश न कर सके, इसे एक तरह से
मेरा आदेश ही मानना। पुत्र गणेश को यह
बोलकर मां गुफा में प्रवेश कर गईं और इस प्रकार अग्रगण्य गणेश जी पहरा देने लगे।
गुफा से बाहर न निकलूं, तब तक तुम मेरी
रक्षा करना और द्वारपाल का कर्तव्य निभाना। पार्वती ने अपने पुत्र गणेश को यह भी
कहा कि गुफा में मेरी अनुमति के बिना कोई भी प्रवेश न कर सके, इसे एक तरह से
मेरा आदेश ही मानना। पुत्र गणेश को यह
बोलकर मां गुफा में प्रवेश कर गईं और इस प्रकार अग्रगण्य गणेश जी पहरा देने लगे।
कुछ समय के बाद माता स्नान करने लगी, तभी शिव जी आ गए।
भगवन गणेश शिव जी से अनभिज्ञ थे, जैसे ही बाबा भोलेनाथ प्रवेश करने लगे तभी गणेश जी ने कहा
ठहरो तुम मेरी माता की आज्ञा बिना प्रवेश नहीं कर सकते हो। शंकर जी ने कहा मूर्ख
बालक तू मुझे नहीं जानता,
तू मुझे रोकेगा।
मैं पार्वती का पति शिव हूं, जिनके तुम पहरेदार हो। चलो यहां से हटो हमें जाने दो। जब
शिव जी ने इतना कहा तो गणेश जी कहने लगे, मैं नहीं जानता आप कौन हो? लेकिन मैं तो बस
इतना जानता हूं की माता की आज्ञा के बिना मैं आपको जाने नहीं दूंगा, आप चाहे जो भी
हों। तब शिव जी ने अपने गणो नंदी भृंगी-श्रृंगी वीरभद्र आदि सब को आदेश दिया कि, जाओ तुम इस बालक
को समझाओ।
भगवन गणेश शिव जी से अनभिज्ञ थे, जैसे ही बाबा भोलेनाथ प्रवेश करने लगे तभी गणेश जी ने कहा
ठहरो तुम मेरी माता की आज्ञा बिना प्रवेश नहीं कर सकते हो। शंकर जी ने कहा मूर्ख
बालक तू मुझे नहीं जानता,
तू मुझे रोकेगा।
मैं पार्वती का पति शिव हूं, जिनके तुम पहरेदार हो। चलो यहां से हटो हमें जाने दो। जब
शिव जी ने इतना कहा तो गणेश जी कहने लगे, मैं नहीं जानता आप कौन हो? लेकिन मैं तो बस
इतना जानता हूं की माता की आज्ञा के बिना मैं आपको जाने नहीं दूंगा, आप चाहे जो भी
हों। तब शिव जी ने अपने गणो नंदी भृंगी-श्रृंगी वीरभद्र आदि सब को आदेश दिया कि, जाओ तुम इस बालक
को समझाओ।
एक-एक कर सभी गणो ने बालक गणेश को शंकर जी के बारे बताया और
उनकी महिमा बनाई। सभी गणों की बात समझने के बाद भी गणेश जी ने कहा की मैं माता का
पुत्र हूं और माता के आदेश का पालन करना मेरा कर्तव्य है और मैं उनकी आज्ञा का
उल्लंघन नहीं होने दूंगा। बालक गणेश के हठ को देखकर सभी शिवगण शिव जी के पास आए
और सम्पूर्ण वृतान्त कह सुनाया।
उनकी महिमा बनाई। सभी गणों की बात समझने के बाद भी गणेश जी ने कहा की मैं माता का
पुत्र हूं और माता के आदेश का पालन करना मेरा कर्तव्य है और मैं उनकी आज्ञा का
उल्लंघन नहीं होने दूंगा। बालक गणेश के हठ को देखकर सभी शिवगण शिव जी के पास आए
और सम्पूर्ण वृतान्त कह सुनाया।
अपने गणों की बात नहीं सुनकर भगवन शिव को क्रोध आ गया।
क्रोधित शिवजी ने आदेश दिया कि जाओ, उस मूर्ख बालक को सबक सिखाओ। समस्त शिव गण अस्त्र-शस्त्र से
सुसज्जित होकर युद्ध करने लगे। भयंकर युद्ध हुआ। शिव गणों की एक भी न चली। भगवन गणेश जी के सामने शिव गण नहीं टिक सके। यही
नहीं स्वयं कार्तिकेय भी युद्ध करने लगे फिर भी वे बालक गणेश को नहीं परास्त कर
सके, तभी भगवन शिव
क्रोधित होकर गणेश जी पर त्रिशूल से प्रहार किया और गणेश जी का सिर काटकर गिरा
दिया। बालक गणेश का सिर पृथ्वी पर गिर गया। उधर जैसे
ही मां पार्वती को पता चला कि उनका पुत्र गणेश मारा गया है, तो माता भयंकर
क्रोध से भर गईं। क्रोध में डूबी माता के शरीर से कई शक्तियों का प्राकट्य हुआ और
उन शक्तियों ने संसार में प्रलय मचाना शुरू कर दिया। पूरा ब्रम्हांड और जगत थर्रा
उठा। सभी ऋषिगण और देवगण त्राहि माम् माम् की आवाज के साथ मिलकर माता का स्तुतिगान
करने लगे।
क्रोधित शिवजी ने आदेश दिया कि जाओ, उस मूर्ख बालक को सबक सिखाओ। समस्त शिव गण अस्त्र-शस्त्र से
सुसज्जित होकर युद्ध करने लगे। भयंकर युद्ध हुआ। शिव गणों की एक भी न चली। भगवन गणेश जी के सामने शिव गण नहीं टिक सके। यही
नहीं स्वयं कार्तिकेय भी युद्ध करने लगे फिर भी वे बालक गणेश को नहीं परास्त कर
सके, तभी भगवन शिव
क्रोधित होकर गणेश जी पर त्रिशूल से प्रहार किया और गणेश जी का सिर काटकर गिरा
दिया। बालक गणेश का सिर पृथ्वी पर गिर गया। उधर जैसे
ही मां पार्वती को पता चला कि उनका पुत्र गणेश मारा गया है, तो माता भयंकर
क्रोध से भर गईं। क्रोध में डूबी माता के शरीर से कई शक्तियों का प्राकट्य हुआ और
उन शक्तियों ने संसार में प्रलय मचाना शुरू कर दिया। पूरा ब्रम्हांड और जगत थर्रा
उठा। सभी ऋषिगण और देवगण त्राहि माम् माम् की आवाज के साथ मिलकर माता का स्तुतिगान
करने लगे।
सभी की स्तुति सुन माता का क्रोध कुछ कम हुआ और माता ने
कहा कि जब तक मेरा पुत्र जीवित नहीं होगा तब तक मेरी शक्तियां इसी प्रकार उत्पात
मचाती रहेंगी।
कहा कि जब तक मेरा पुत्र जीवित नहीं होगा तब तक मेरी शक्तियां इसी प्रकार उत्पात
मचाती रहेंगी।
माता की यह बात सुनकर सभी ब्रम्हादि देवताओं ने शिव जी से
आग्रह किया की प्रभु आप गणपति को शीघ्र नवजीवन प्रदान करें नहीं तो सृस्टि का
कार्य रुक जाएगा। तब भगवन भोलेनाथ ने
उत्तर दिशा में अपने त्रिशूल से प्रहार किया, जहां पर पूर्व
श्रापित एक गजराज बैठे थे। त्रिशुल गजराज का
सिर काटकर ले आया और उसके सिर को बालक गणेश के धड़ में जोड़ा गया। और बालक को गणेश
को जीवनदान मिलने के बाद शंकर जी ने पुत्र गणेश को आशीर्वाद दिया कि तुमसे पूरे
संसार में शुभता का वास होगा। तुम देवों में सबसे पहले प्रथम पूज्य होंगे, और तुम्हारे
बिना कोई भी शुभ कार्य नहीं होगा। तुम बुद्धि के अधिपति देवता होगे और अनंतकाल तक
पृथ्वी पर पूजे जाओगे।
आग्रह किया की प्रभु आप गणपति को शीघ्र नवजीवन प्रदान करें नहीं तो सृस्टि का
कार्य रुक जाएगा। तब भगवन भोलेनाथ ने
उत्तर दिशा में अपने त्रिशूल से प्रहार किया, जहां पर पूर्व
श्रापित एक गजराज बैठे थे। त्रिशुल गजराज का
सिर काटकर ले आया और उसके सिर को बालक गणेश के धड़ में जोड़ा गया। और बालक को गणेश
को जीवनदान मिलने के बाद शंकर जी ने पुत्र गणेश को आशीर्वाद दिया कि तुमसे पूरे
संसार में शुभता का वास होगा। तुम देवों में सबसे पहले प्रथम पूज्य होंगे, और तुम्हारे
बिना कोई भी शुभ कार्य नहीं होगा। तुम बुद्धि के अधिपति देवता होगे और अनंतकाल तक
पृथ्वी पर पूजे जाओगे।
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