Wednesday, 4 December 2019

भगवान शिव और गणेश जी के बीच महाप्रलयंकारी युद्ध...



शिव और गणेश युद्ध
हिन्दू धर्म के अनुसार 35 करोड़ देवी
देवताओं में गणपति का स्थान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। वैसे तो सभी देवी
देवता एक समान
हैं किन्तु ब्रह्मा और विष्णु जी द्वारा दिए गए सर्वप्रथम पूजनीय देव के वरदान के
कारण शिवपुत्र को सर्वश्रेष्ठ देव स्वरुप में पूजा जाता है। उनकी पूजा आज भी हर घर
, हर मंदिर, किसी भी शुभ
कार्य को करने से पहले की जाती है । भगवान गणेश हर रूप में पूजनीय हैं
, उन्हें एकदंत, सिद्धिविनायक, अष्टविनायक के
रूप में भी पूजा जाता है।
दोस्तों आज
हम इस विडियो मे भगवान गणेश से जुड़ी एक रोचक कहानी सुनेंगे। क्या हुआ जब भगवान
गणेश का सामना स्वयं भगवान शिव से हो गया था। 
एक समय की बात है। मां पार्वती स्नान के लिए जा रही थीं, तब अपनी विजया आदि
सखियों के कहने पर एक पुतले का निर्माण किया। उस पुतले में माता ने पंचवायु तथा
प्राण आदि डाल कर उसमें परम तेजस्वी ओज का आवाहन किया। वह पुतला सुन्दर बाल पुरुष
में परिवर्तित हो गया। मां पार्वती
ने उस बालक को
सुन्दर मनोहारी वस्त्र आभूषण आयुध आदि प्रदान किया। माता ने उस पुतले से कहा
, तुम मेरे पुत्र
हो और आज से तुम्हारा नाम गणेश होगा। इस तरह दोनों के बीच एक प्रगाढ़ संबंध का भी
अविर्भाव हुआ
ठीक उसी समय पार्वती ने अपने पुत्र गणेश से कहा, जब तक मैं इस
गुफा से बाहर न निकलूं
, तब तक तुम मेरी
रक्षा करना और द्वारपाल का कर्तव्‍य निभाना। पार्वती ने अपने पुत्र गणेश को यह भी
कहा कि गुफा में मेरी अनुमति के बिना कोई भी प्रवेश न कर सके
, इसे एक तरह से
मेरा आदेश ही मानना।  पुत्र गणेश को यह
बोलकर मां गुफा में प्रवेश कर गईं और इस प्रकार अग्रगण्य गणेश जी पहरा देने लगे।
कुछ समय के बाद माता स्नान करने लगी, तभी शिव जी आ गए।
भगवन गणेश शिव जी से अनभिज्ञ थे
, जैसे ही बाबा भोलेनाथ प्रवेश करने लगे तभी गणेश जी ने कहा
ठहरो तुम मेरी माता की आज्ञा बिना प्रवेश नहीं कर सकते हो। शंकर जी ने कहा मूर्ख
बालक तू मुझे नहीं जानता
,
तू मुझे रोकेगा।
मैं पार्वती का पति शिव हूं
, जिनके तुम पहरेदार हो। चलो यहां से हटो हमें जाने दो। जब
शिव जी ने इतना कहा तो गणेश जी कहने लगे
, मैं नहीं जानता आप कौन हो?  लेकिन मैं तो बस
इतना जानता हूं की माता की आज्ञा के बिना मैं आपको जाने नहीं दूंगा
, आप चाहे जो भी
हों। तब शिव जी ने अपने गणो नंदी भृंगी-श्रृंगी वीरभद्र आदि सब को आदेश दिया कि
, जाओ तुम इस बालक
को समझाओ।
एक-एक कर सभी गणो ने बालक गणेश को शंकर जी के बारे बताया और
उनकी महिमा बनाई। सभी गणों की बात समझने के बाद भी गणेश जी ने कहा की मैं माता का
पुत्र हूं और माता के आदेश का पालन करना मेरा कर्तव्‍य है और मैं उनकी आज्ञा का
उल्‍लंघन नहीं होने दूंगा। बालक गणेश के हठ को देखकर सभी शिवगण शिव जी के पास आए
और सम्पूर्ण वृतान्त कह सुनाया।
अपने गणों की बात नहीं सुनकर भगवन शिव को क्रोध आ गया।
क्रोधित शिवजी ने आदेश दिया कि जाओ
, उस मूर्ख बालक को सबक सिखाओ। समस्त शिव गण अस्त्र-शस्त्र से
सुसज्जित होकर युद्ध करने लगे। भयंकर युद्ध हुआ। शिव गणों की एक भी न चली।  भगवन गणेश जी के सामने शिव गण नहीं टिक सके। यही
नहीं स्‍वयं कार्तिकेय भी युद्ध करने लगे फिर भी वे बालक गणेश को नहीं परास्त कर
सके
, तभी भगवन शिव
क्रोधित होकर गणेश जी पर त्रिशूल से प्रहार किया और गणेश जी का सिर काटकर गिरा
दिया।
बालक गणेश का सिर पृथ्वी पर गिर गया। उधर जैसे
ही मां पार्वती को पता चला कि उनका पुत्र गणेश मारा गया है
, तो माता भयंकर
क्रोध से भर गईं। क्रोध में डूबी माता के शरीर से कई शक्तियों का प्राकट्य हुआ और
उन शक्तियों ने संसार में प्रलय मचाना शुरू कर दिया। पूरा ब्रम्हांड और जगत थर्रा
उठा। सभी ऋषिगण और देवगण त्राहि माम् माम् की आवाज के साथ मिलकर माता का स्‍तुतिगान
करने लगे।
सभी की स्‍तुति सुन माता का क्रोध कुछ कम हुआ और माता ने
कहा कि जब तक मेरा पुत्र जीवित नहीं होगा तब तक मेरी शक्तियां इसी प्रकार उत्पात
मचाती रहेंगी।
माता की यह बात सुनकर सभी ब्रम्हादि देवताओं ने शिव जी से
आग्रह किया की प्रभु आप गणपति को शीघ्र नवजीवन प्रदान करें नहीं तो सृस्टि का
कार्य रुक जाएगा। तब भगवन  भोलेनाथ ने
उत्तर दिशा में अपने त्रिशूल से प्रहार किया
, जहां पर पूर्व
श्रापित एक गजराज बैठे थे।
त्रिशुल गजराज का
सिर काटकर ले आया और उसके सिर को बालक गणेश के धड़ में जोड़ा गया। और बालक को गणेश
को जीवनदान मिलने के बाद शंकर जी ने पुत्र गणेश को आशीर्वाद दिया कि तुमसे पूरे
संसार में शुभता का वास होगा। तुम देवों में सबसे पहले प्रथम पूज्‍य होंगे
, और तुम्‍हारे
बिना कोई भी शुभ कार्य नहीं होगा। तुम बुद्धि के अधिपति देवता होगे और अनंतकाल तक
पृथ्‍वी पर पूजे जाओगे।

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