अर्जुन और इंद्रजीत
महाभारत और रामायण सिर्फ एक कथा नहीं है, ना ही वह एक ग्रन्थ है। यह
हमारा वास्तविक जीवन है जो हर युग में, हर क्षेत्र में अपने आप को दोहराता है। कर्म करना हर जीव का धर्म है। भूल एक परिणाम है पाप नहीं।
लेकिन भूल को बार बार दोहराना और उस पर पश्चतवा न करना पाप अवश्य है। लेकिन इस पाप
को सुधारने के लिए ईश्वर स्वयं हमारे समक्ष कई रूपों में आ जाते हैं। उन्हें
पहचाना भी हमारा कर्म हैं। वे हमें हमारी भूल सुधारने के कई मार्ग सामने रखते हैं। कौनसा मार्ग चुनना
हमारा कर्म है। चाहे आस्तिक हो या नास्तिक, एक न एक दिन हमें हमारे इस शरीर को त्यागना ही है। हमारे कर्म हमारे शरीर
त्यागने के मार्ग तय करेगा। दोस्तों
हमने अपने कई विडियो मे रामायण और महाभारत के पात्रो की तुलना की है आज उसी कर्म
को आगे बढ़ाते हुए हम एक बार फिर इन दोनों ग्रंथो के दो महान पात्रो की तुलना
करेंगे। पहला नाम है महाभारत का महान धनुर्धर अर्जुन और दूसरा नाम है रावण का
महाप्रतापी पुत्र इंद्रजीत। आइये दोनों योद्धाओं की काबलियत पर बात करते हैं और ये
समझने का प्रयास करते हैं की कौन किससे श्रेष्ठ है।
हमारा वास्तविक जीवन है जो हर युग में, हर क्षेत्र में अपने आप को दोहराता है। कर्म करना हर जीव का धर्म है। भूल एक परिणाम है पाप नहीं।
लेकिन भूल को बार बार दोहराना और उस पर पश्चतवा न करना पाप अवश्य है। लेकिन इस पाप
को सुधारने के लिए ईश्वर स्वयं हमारे समक्ष कई रूपों में आ जाते हैं। उन्हें
पहचाना भी हमारा कर्म हैं। वे हमें हमारी भूल सुधारने के कई मार्ग सामने रखते हैं। कौनसा मार्ग चुनना
हमारा कर्म है। चाहे आस्तिक हो या नास्तिक, एक न एक दिन हमें हमारे इस शरीर को त्यागना ही है। हमारे कर्म हमारे शरीर
त्यागने के मार्ग तय करेगा। दोस्तों
हमने अपने कई विडियो मे रामायण और महाभारत के पात्रो की तुलना की है आज उसी कर्म
को आगे बढ़ाते हुए हम एक बार फिर इन दोनों ग्रंथो के दो महान पात्रो की तुलना
करेंगे। पहला नाम है महाभारत का महान धनुर्धर अर्जुन और दूसरा नाम है रावण का
महाप्रतापी पुत्र इंद्रजीत। आइये दोनों योद्धाओं की काबलियत पर बात करते हैं और ये
समझने का प्रयास करते हैं की कौन किससे श्रेष्ठ है।
अर्जुन अपने समय के सबसे शक्तिशाली धनुर्धर योद्धा थे। वे सव्यसाची
थे, अर्थात दोनो
हाथों से समान बाण चला सकते थे, दो मील दूर तक वार कर सकते थे, शब्दभेदी बाण चला
सकते थे, अंधेरे में युद्ध
कर सकते थे, निद्रा पर विजय
प्राप्त कर देर तक युद्ध कर सकते थे, अपनी एकाग्रता व अचूक निशाने के लिए प्रसिद्ध थे। उनके बाजु
इतने शक्तिशाली थे की सामान्य धनुष आसानी से टूट जाते थे। उनका दिव्य धनुष गांडीव
इतना भारी था कि उसको उठाना या उसपर प्रत्यंचा चढ़ाना सामान्य बात नहीं थी, और उसपर
प्रत्यंचा अर्जुन के अलावा केवल श्रीकृष्ण व भीम ही चढ़ा सकते थे।
थे, अर्थात दोनो
हाथों से समान बाण चला सकते थे, दो मील दूर तक वार कर सकते थे, शब्दभेदी बाण चला
सकते थे, अंधेरे में युद्ध
कर सकते थे, निद्रा पर विजय
प्राप्त कर देर तक युद्ध कर सकते थे, अपनी एकाग्रता व अचूक निशाने के लिए प्रसिद्ध थे। उनके बाजु
इतने शक्तिशाली थे की सामान्य धनुष आसानी से टूट जाते थे। उनका दिव्य धनुष गांडीव
इतना भारी था कि उसको उठाना या उसपर प्रत्यंचा चढ़ाना सामान्य बात नहीं थी, और उसपर
प्रत्यंचा अर्जुन के अलावा केवल श्रीकृष्ण व भीम ही चढ़ा सकते थे।
मेघनाद पितृभक्त पुत्र था।उसे यह पता चलने पर की राम
स्वयं भगवान है फिर भी उसने पिता का साथ नही छोड़ा। मेघनाद की भी पितृभक्ति प्रभु
राम के समान अतुलनीय है। जब उसकी मां मन्दोदरी ने उसे यह कहा कि इंसान मुक्ति की
तरफ अकेले जाता है तब उसने कहा कि पिता को ठुकरा कर अगर मुझे स्वर्ग भी मिले तो
मैं ठुकरा दूँगा। अपने पिता की तरह
यह भी स्वर्ग विजयी था। इंद्र को परास्त करने के कारण ही ब्रह्मा जी ने इसका नाम
इंद्रजीत रखा था। आदिकाल से अब तक यही एक मात्र ऐसा योद्धा है जिसे अतिमहारथी की
उपाधि दी गई है। इसका नाम रामायण में इसलिए लिया
जाता है क्योंकि इसने राम- रावण युद्ध में एहम भूमिका निभाई थी। इसका नाम उन
योद्धाओं में लिया जाता है जो की ब्रह्माण्ड अस्त्र, वैष्णव अस्त्र
तथा पाशुपात अस्त्र के धारक कहे जाते हैं। इसने अपने गुरु शुक्राचार्य के
सान्निध्य में रहकर तथा त्रिदेवों द्वारा कई अस्त्र- शस्त्र एकत्र किए। स्वर्ग में
देवताओं को हरा कर उनके अस्त्र शस्त्र पर भी अधिकार कर लिया।
स्वयं भगवान है फिर भी उसने पिता का साथ नही छोड़ा। मेघनाद की भी पितृभक्ति प्रभु
राम के समान अतुलनीय है। जब उसकी मां मन्दोदरी ने उसे यह कहा कि इंसान मुक्ति की
तरफ अकेले जाता है तब उसने कहा कि पिता को ठुकरा कर अगर मुझे स्वर्ग भी मिले तो
मैं ठुकरा दूँगा। अपने पिता की तरह
यह भी स्वर्ग विजयी था। इंद्र को परास्त करने के कारण ही ब्रह्मा जी ने इसका नाम
इंद्रजीत रखा था। आदिकाल से अब तक यही एक मात्र ऐसा योद्धा है जिसे अतिमहारथी की
उपाधि दी गई है। इसका नाम रामायण में इसलिए लिया
जाता है क्योंकि इसने राम- रावण युद्ध में एहम भूमिका निभाई थी। इसका नाम उन
योद्धाओं में लिया जाता है जो की ब्रह्माण्ड अस्त्र, वैष्णव अस्त्र
तथा पाशुपात अस्त्र के धारक कहे जाते हैं। इसने अपने गुरु शुक्राचार्य के
सान्निध्य में रहकर तथा त्रिदेवों द्वारा कई अस्त्र- शस्त्र एकत्र किए। स्वर्ग में
देवताओं को हरा कर उनके अस्त्र शस्त्र पर भी अधिकार कर लिया।
आइये दोस्तों दोनों ही
योद्धाओं की विशेषताओं पर नज़र डालते हैं और ये समझने का प्रयास करते हैं की कौन
अधिक श्रेष्ठ था।
योद्धाओं की विशेषताओं पर नज़र डालते हैं और ये समझने का प्रयास करते हैं की कौन
अधिक श्रेष्ठ था।
शिक्षा के आधार पर देखा जाए
तो दोनों को महान गुरुओं का सनीध्य मिला अर्जुन के गुरु थे गुरु द्रोण और इंद्रजीत
के गुरु थे गुरु शुक्राचार्य दोनों ही योद्धा शिक्षा के आधार पीआर समान ही नज़र आ
रहे हैं।
तो दोनों को महान गुरुओं का सनीध्य मिला अर्जुन के गुरु थे गुरु द्रोण और इंद्रजीत
के गुरु थे गुरु शुक्राचार्य दोनों ही योद्धा शिक्षा के आधार पीआर समान ही नज़र आ
रहे हैं।
अस्त्र शस्त्र
अर्जुन ने हिमालय पे तपस्या
कर के भगवान शिव से पासूप्तास्त्र प्राप्त कर लिया था। अग्नि देव से उन्होने
अगन्यासत्र प्राप्त किए थे। इंद्रा देव ने भी अनेकों दिव्यास्त्र अर्जुन को प्रदान
किए थे। अर्जुन के पास अक्षय तरकश और गाँडीव धनुष भी थे। वरुण देव ने उन्हे
नंदीघोष नामक विशाल रथ दिया था। अर्जुन के पास ब्रह्मास्त्र और ब्रहमशिरा अस्त्र
भी था।
कर के भगवान शिव से पासूप्तास्त्र प्राप्त कर लिया था। अग्नि देव से उन्होने
अगन्यासत्र प्राप्त किए थे। इंद्रा देव ने भी अनेकों दिव्यास्त्र अर्जुन को प्रदान
किए थे। अर्जुन के पास अक्षय तरकश और गाँडीव धनुष भी थे। वरुण देव ने उन्हे
नंदीघोष नामक विशाल रथ दिया था। अर्जुन के पास ब्रह्मास्त्र और ब्रहमशिरा अस्त्र
भी था।
परंतु इंद्रजीत के पास नारायण
अस्त्र ब्रह्मास्त्र और पसुप्तास्त्र था इन तीनों अस्त्र का एक साथ एक वायक्ति के
पास होना ही उस को अस्त्रों के मापदंड पर श्रेष्ठ बनाती है।
अस्त्र ब्रह्मास्त्र और पसुप्तास्त्र था इन तीनों अस्त्र का एक साथ एक वायक्ति के
पास होना ही उस को अस्त्रों के मापदंड पर श्रेष्ठ बनाती है।
हम सब को पता है की इंद्रजीत
एक मायावी योद्धा था उसने अपनी माया से अनेकों अनेक योद्धाओं को परास्त किया था
इसी माया के बल पर उसने स्वर्ग पर आक्रमण किया और इंद्रा तक को परास्त कर
दिया था परंतु अर्जुन के paas ऐसे अनेक अस्त्र थे जिससे वो किसी भी
माया को खतम कर सकता था। महाभारत युद्ध मे अर्जुन ने निवटकवच, चित्रा सेन जिसे मायावी असुरों को परास्त कर ये बात साबित केआर दी थी की
वो किसे से कम नहीं है, बात इंद्रा की हो तो अर्जुन ने
इंद्रप्रस्थ स्थापना और खंडाव दहन के समय इंद्रा तक को परास्त कर दिया था।
एक मायावी योद्धा था उसने अपनी माया से अनेकों अनेक योद्धाओं को परास्त किया था
इसी माया के बल पर उसने स्वर्ग पर आक्रमण किया और इंद्रा तक को परास्त कर
दिया था परंतु अर्जुन के paas ऐसे अनेक अस्त्र थे जिससे वो किसी भी
माया को खतम कर सकता था। महाभारत युद्ध मे अर्जुन ने निवटकवच, चित्रा सेन जिसे मायावी असुरों को परास्त कर ये बात साबित केआर दी थी की
वो किसे से कम नहीं है, बात इंद्रा की हो तो अर्जुन ने
इंद्रप्रस्थ स्थापना और खंडाव दहन के समय इंद्रा तक को परास्त कर दिया था।
अर्जुन और इंद्रजीत के विषय
मे आपके विचार अपने कमेंट बॉक्स मे लिखें
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कृष्ण मित्र अर्जुन और रावण पुत्र इंद्रजीत के बीच युद्ध में
कौन विजयी होता ??? Kaal
Chakra
कौन विजयी होता ??? Kaal
Chakra
Yeh koi sawal nahi hua Dono mein comparison hai hi nahi indrajeet was athimaharathi he can fight 12 maharathi single hand also he was indrajeet I. E Indra was arjuna's father
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